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अस्पताल जाना वरदान या अभिशाप : इलाज पर बढ़ते खर्च ने हालात किए भयावह 


आज हालात भयावह हैं लेकिन, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि आज भी हजारों ऐसे डॉक्टर हैं, जो सेवा को धर्म मानते हैं और ईमानदारी से मरीजों का इलाज करते हैं। हमें उन डॉक्टरों को सम्मान देना होगा और बाकी व्यवस्था को बदलने के लिए आवाज़ उठानी होगी। इंदौर से पढ़िए, प्रियंका पवनघुवारा का यह आलेख…


ललितपुर । भारत जैसे देश में जहां लाखों लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं, आज इलाज से अधिक महंगा वह डर है, जो हर परिवार को अस्पताल की ओर कदम बढ़ाते समय घेर लेता है। यह केवल अस्पताल या डॉक्टर का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे समाज की नैतिकता का संकट है। जब शिक्षा को व्यवसाय बना दिया गया तो डॉक्टर फैक्टरी से निकलने लगे। मेडिकल शिक्षा में भारी खर्च होता है। इस चक्र ने सेवा की भावना को कुचल दिया है। इस भयावह स्थिति से निकलने के लिए केवल शिकायत करना पर्याप्त नहीं है। सच है कि आज हालात भयावह हैं लेकिन, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि आज भी हजारों ऐसे डॉक्टर हैं जो सेवा को धर्म मानते हैं और ईमानदारी से मरीजों का इलाज करते हैं। हमें उन डॉक्टरों को सम्मान देना होगा और बाकी व्यवस्था को बदलने के लिए आवाज़ उठानी होगी।

सरकारी अस्पतालों को मज़बूत किया जाए

तकनीकी युग में मूल्य-संरक्षण कठिन होता जा रहा है। उपभोक्तावाद ने जीवन को प्रतिस्पर्धा और दिखावे में बदल दिया है। अस्पताल जाना किसी सौदेबाज़ी का हिस्सा नहीं होना चाहिए। जब तक व्यवस्था में पारदर्शिता और इंसानियत नहीं लौटती, तब तक हर परिवार यही सवाल पूछता रहेगा। समाधान यही है कि सरकारी अस्पतालों को मज़बूत किया जाए, मेडिकल शिक्षा में सुधार हो। कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना जरूरी है ताकि आम आदमी महंगे निजी अस्पतालों का शिकार न बने। दवाइयों और टेस्ट पर सख्त नियंत्रण हो ताकि अनावश्यक बोझ मरीज पर न डाला जा सके। मेडिकल शिक्षा में सुधार जरूरी है जिससे केवल पैसा कमाने वाले नहीं, बल्कि सेवा भाव रखने वाले युवा डॉक्टर तैयार हों।

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