निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी की ओर विहार कर रहे हैं। वे जहां भी विश्राम करते हैं वहां धर्मसभा को संबोधित अवश्य करते हैं। उनके प्रवचनों में जीवन-दर्शन के साथ जैन दर्शन का समावेश होता है। उनके प्रबोधन सुनकर धर्मावलंबी जैन समाज पुण्य अर्जित कर धर्म प्रभावना का लाभ लेते हैं। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर…
सागर। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहते हैं कि लोग सोचते हैं कि समय बदलता है और समय बदलता है तो सबकुछ बदल जाता है। ऐसी लोगों की धारणा है लेकिन, जब शास्त्रों में देखा कि समय काल द्रव्य की परिणति है वह कभी बदलता ही नहीं है, वह तो मात्र गतिशील है। समय एक शुद्ध काल द्रव्य है। शुद्ध में कभी परिवर्तन नहीं होता, एक समान रूप से उत्पाद, व्यय होता रहता है, हीनाधिक कभी नहीं होता। कभी अच्छा समय, कभी बुरा समय, कभी खाने का समय, कभी उठने का समय, कभी सोने का समय, कभी प्रवचन का समय, ये जो समय के आरोप हैं, ये हमारे मन को बहुत हतोत्साहित करते हैं और व्यक्ति वहां किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि मेरा समय अच्छा क्यों नहीं आ रहा है और व्यक्ति ये सोच नहीं पाता कि समय कभी अच्छाऋबुरा होता ही नहीं है।
जितनी बाधाएं हैं सब अंदर की बाधाएं हैं
घड़ी के पूरे 12 घंटों में कोई भी नंबर, अशुभ नहीं है और कोई भी घंटा शुभ नहीं है। वो तो घड़ी गतिमान होती है, चलती रहती है, शुभ-अशुभ की कल्पनाएं शुद्ध द्रव्यों में नहीं होती। व्यक्ति स्वयं गलती करता है तो अब ये गलती किसपे थोपूं तो लोग कहते हैं कि मेरा अच्छा समय नहीं चल रहा है या कोई ऊपरी बाधा है। बंधुओं न समय की बाधा है, न ऊपर की बाधा है, जितनी बाधाएं हैं सब अंदर की बाधाएं हैं। जब-जब अपनी जिंदगी में यह बात आती है कि समय अच्छा नहीं है।
दोनों द्रव्य बिगड़ जाए तो नरकों की सैर करा दें
समय आएगा तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। उन व्यक्तियों का कभी अच्छा समय नहीं आना क्योंकि, समय में अच्छे बुरे की कल्पना है ही नहीं। मात्र दो द्रव्यों में अच्छे बुरे की कल्पना होती है जीव और पुद्गल, यही स्वभाव और विभाव में परिणमन करते हैं। दोनों द्रव्य यदि मिल जाए तो सारे जन्नत की सैर करा दें और दोनों द्रव्य बिगड़ जाए तो नरकों की सैर करा दें।
कभी पुद्गल से बैर नहीं करना
जितना भी तुम्हारा कभी कोई कुछ बिगाड़ेगा तो पुद्गल द्रव्य बिगाड़ेगा और पुद्गल को भी बिगड़ेगा तो कोई न कोई जीव द्रव्य बिगाडे़गा। जीव ही पुद्गल की दुर्दशा करता है फिर पुद्गल भी बदला लेता है कि तूने मुझे सताया है तो मैं तुझे सुखी नहीं रहने दूंगा। इसलिए हमें विचार करना है कि संसार में रहना है तो कभी पुद्गल से बैर नहीं करना क्योंकि, पुद्गल बहुत खतरनाक होता है वह जड़ है, इसलिए जब व्रत दिया गया 12 व्रतों में तो परिग्रह परिमाण व्रत दिया गया। परिग्रह परिमाण व्रत में सबसे ज्यादा वस्तुएं पुद्गल हैं।
सज्जनों से पहले दुर्जनों की पूजा किया करो
अचेतन का परिमाण करो, अचेतन का अनर्थदंड मत करो अन्यथा ये अचेतन हमारे लिए असाता कर्म के रूप में आकर हमें दुःखी करता है, इसलिए वास्तु में कहा तुम पुद्गल का मात्र उपभोग ही मत करना, पुद्गल को मात्र अपने जीवन की उपयोगिता की वस्तु मत बनाना। कुछ थोड़ा बहुत पुद्गलों को पूछते भी रहा करो और कहा है कि सज्जनों से पहले दुर्जनों की पूजा किया करो। मकान बनाते हो आप लोग तो पूरा मकान आपके उपयोग के लिए है लेकिन, वास्तु कहता है कि एक थोड़ा सा स्थान पूजा के लिए बना देना, जिससे पुद्गल नाराज न हो जाए अन्यथा यही मकान तुम्हें मिटा देगा।
कोई भी सूत्र होते हैं, मल्टी पर्पज होते हैं
वैष्णव दर्शन में तो सारे पुद्गलों को देवता का रूप दिया लेकिन, जैन दर्शन ने देवता का रूप तो नहीं दिया। बार-बार कहा कि पुद्गल का अनादर नहीं करना। दूसरे रूप में उन्होंने कहा कि तुम जल का उपयोग करते हो, जल तुम्हें बर्बाद कर देगा क्योंकि, जल कहता है कि मैं शुद्ध था और तुमने मुझे उपयोग करके गंदा कर दिया। इसलिए जैन दर्शन ने दूसरा निकाला कि यदि तुम जल का उपयोग करते हो तो जल को नाराज मत करना नहीं तुझे यह जल तुम्हें बूंद-बंद पानी को तरसा देगा तो फिर क्या करें, तुम जल का उपयोग करके गंदा बनाते हो। 24 घंटे में जल को थोड़ा सा गंधोदक बना दिया करो। अग्नि का तुम उपयोग करते हो, कहीं यह अग्नि तुम्हे अभिशाप न दे दे। इसलिए पूजा में थोड़ा सा दीप जला दिया करो। इसी प्रकार से तुम वनस्पति का प्रयोग करते हो। उसके बिना जी नहीं सकते, थोड़ा मुट्ठी भर चावल अर्घ्य का चढ़ा दिया करो। पूरी पृथ्वी का उपयोग करते हो, मकान बनाते हो, पैरों से रौंदते हो तो भारतीय दर्शन कहते हैं कि अपने गांव के छोटे से पृथ्वी के टुकड़े पर मंदिर बना दिया करो। कोई भी सूत्र होते हैं, मल्टी पर्पज होते हैं।
नैतिकता रहित व्यक्ति से संसार बिगड़ जाता है
किसी भी वस्तु के दो पहलू सोचना चाहिए-एक सिद्धांतिक और एक नैतिक। सैद्धांतिक तो अपन सबको मालूम है कि परंपरा से मोक्ष के कारण है लेकिन, एक नैतिक होता है। मैं नैतिक संबंधों की बात कर रहा हूं कि पृथ्वी या जल के साथ तुम्हारा नैतिक संबंध अच्छा है या बुरा। नैतिक संबंध का अर्थ होता है कि कोई हमारे काम आया है तो हमें भी उसके काम आना चाहिए। किसी ने हमारे जीवन में सुख दिया है तो हम भी उसके लिए सुख दें। किसी ने हमारे लिए ऊंचाइयां दी हैं तो हम भी किसी के रूप में उसके लिए ऊंचाइयां देंगे। यदि नैतिकता से व्यक्ति रहित हो जाता है तो संसार बिगड़ जाता है और सिद्धांत से रहित हो जाता है तो परमार्थ बिगड़ जाता है। दान देने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारा पैसा खर्च कराना, दान देने का अर्थ है कि तुम्हें अमीर बनने की सिद्धि कराना। दान को शास्त्रों में कभी खर्चे में नहीं लिया, बीज में लिया। धर्म का कार्य कभी भी भार मानकर नहीं, सौभाग्य मानकर करना।













Add Comment