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वंतारा अभ्यारण्य भेजी हथिनी माधुरी को वापस दो : अर्जी हमारी है मर्जी तुम्हारी है


जहां श्रद्धा और करुणा थी, वहां अब कारोबार और तंत्र की कठोरता है। प्रियंका पवन घुवारा ने कहा कि महाराष्ट्र का गौरव, हथिनी माधुरी महादेवी जो नांदणी मठ में एक परिवार के सदस्य की तरह सम्मानित, पूजित और सेवा-संरक्षित की जाती थी, आज वंतारा (जामनगर) में पेटा की याचिका और कोर्ट के आदेश के चलते एक अमीर की जागीर में सजीव प्रदर्शन का हिस्सा बना दी गई है। कोल्हापुर से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


कोल्हापुर। महाराष्ट्र का गौरव, हथिनी माधुरी महादेवी जो नांदणी मठ में एक परिवार के सदस्य की तरह सम्मानित, पूजित और सेवा-संरक्षित की जाती थी, आज वंतारा (जामनगर) में पेटा की याचिका और कोर्ट के आदेश के चलते एक अमीर की जागीर में सजीव प्रदर्शन का हिस्सा बना दी गई है। नांदणी मठ कोई साधारण जगह नहीं, यह एक सदियों से चले आ रहे जैन संतों का तीर्थ स्थल है। वहां जानवरों के साथ भी आत्मा के रूप में व्यवहार होता है। हथिनी माधुरी केवल हाथी नहीं थी, वह श्रद्धा, सेवा और धर्म की जीती-जागती प्रतीक थी। आज पूंजीपतियों की इच्छाएं न्याय प्रणाली से भी ऊपर लगती हैं। पेटा जिसने कभी भी बूचड़खानों में कटने वाले बछड़ों, गायों या बैलों के लिए कोई गंभीर जनहित याचिका दाखिल नहीं की, वह अचानक धार्मिक स्थल से एक हथिनी को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया? क्या यह एक तयशुदा एजेंडा नहीं? पेटा नाम तो रखता है नैतिक व्यवहार का, पर क्या सिर्फ अमीर व्यापारियों की सलाह और पैसा ही उनकी नैतिकता तय करता है? पशु कल्याण के नाम पर एक सज्जन मठ से हथिनी को उठा लेना, लेकिन कसाईखानों पर चुप्पी यह नैतिकता नहीं, सुविधा आधारित दिखावा है।

वंतारा अभयारण्य या निजी प्रदर्शन गृह ?

मार्च 2025 में खोला गया वंतारा एक आलीशान निजी परिसर सार्वजनिक पहुंच से बाहर है। वहां के जानवरों को देखना भी केवल कुछ विशेष और संपन्न वर्ग के लिए ही संभव है। फिर यह संरक्षण किसके लिए है? मार्क्समेन डेली की मई 2025 की रिपोर्ट ने इसे “एक व्यर्थ, भोगवादी परियोजना” बताते हुए इसकी आलोचना की थी। मठ में रहने वाले जीव भी पवित्रता और आत्मा के रूप में पूजनीय होते हैं। ऐसे जीव का स्थानांतरण केवल शारीरिक नहीं, आध्यात्मिक क्षति भी है। माधुरी को उसकी प्राकृतिक, आत्मीय और आदर्श देखभाल करने वाले स्थान से असहमति और अनैतिक रूप से हटाया गया। वह मठ और महाराष्ट्र की संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पहचान की जीवंत प्रतीक थी। उसका छिन जाना, एक सांस्कृतिक आघात है। माधुरी को मठ में लौटाओ, बेजुबान की पुकार सुनो! यह केवल एक हथिनी की वापसी की मांग नहीं, यह धर्म, करुणा, संवेदना और न्याय की पुनर्स्थापना की मांग है। माधुरी अब भी जिन्दा है, पर वह उस घर में नहीं, जहां उसकी आत्मा थी। बेजुबान की आंखों में आँसू और इंसान की आत्मा में मौन यह सभ्यता नहीं हो सकती।

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