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गर्भकल्याणक : गिरार जी में आचार्य विशुद्ध सागर जी ससंघ के सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव


अतिशयकारी आदिनाथ भगवान की छत्रछाया में चर्याशिरोमणी आचार्य विशुद्ध सागर ससंघ 27 मुनिराजों के पावन सानिध्य में आयोजित हो रहे श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के द्वितीय दिवस के कार्यक्रम में गर्भकल्याणक मनाया गया। पढ़िए प्रियंक सर्राफ की विस्तृत रिपोर्ट…


गिरार(मड़ावरा)। धसान नदी के किनारे विराजमान जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर अतिशयकारी आदिनाथ भगवान की छत्रछाया में चर्याशिरोमणी आचार्य विशुद्ध सागर ससंघ 27 मुनिराजों के पावन सानिध्य में आयोजित हो रहे श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के द्वितीय दिवस के कार्यक्रम में गर्भकल्याणक मनाया गया। गर्भकल्याणक के उत्तर रूप की क्रियाओं को कार्यक्रम के प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी जयनिशांत व सहप्रतिष्ठाचार्य सनत कुमार,विनोद कुमार द्वारा सम्पन्न कराया गया। महोत्सव में भोपाल से आए संगीतकार रामकुमार एंड पार्टी ने माहौल को धर्ममय बनाया। महोत्सव को सफल बनाने में अतिशय क्षेत्र गिरार गिरी प्रबंध कारणी समिति द्वारा पूर्णमनोभाव से कार्य किया जा रहा है।

व्यक्ति का जन्म लेना व मरण होना भी हिंसा

महोत्सव के द्वितीय दिवस की क्रियाओं में सुबह 6.15 बजे से भगवान जिनेन्द्र देव की प्रतिमा का अभिषेक,शांतिधारा, नित्य पूजा, गर्भकल्याणक पूजन किया गया। इसके बाद हवन किया गया। सुबह नौ बजे भव्य सभागार में विराजमान आचार्य विशुद्ध सागर जी ने उपस्थित जनसमुदाय को अपनी मंगल देशना देते हुए कहा कि किसी संयोग का वियोग निश्चित है। व्यक्ति का जन्म लेना व मरण होना भी हिंसा है। धर्म उन लोगों से नहीं चलता जो खूंटे से बंधे हैं। धर्म उन लोगों से चलता है जो विश्व में सबके साथ एकता के साथ खड़े हैं और अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं।

बताए गए 16 स्वप्नों के फल

दोपहर की क्रियाओं में माता मरुदेवी की गोद भराई(सीमंतनी क्रिया) का आयोजन किया गया, जिसमें महिलाओं ने भक्तिभाव पूर्वक माता की गोद भराई की। रात्रि कालीन कार्यक्रम में देवियों द्वारा माता को जगाना, मंगल स्नान, श्रृंगार, छप्पन कुमारियों द्वारा भेंट समर्पण एवं महाराज नाभिराय के दरबार का आयोजन किया गया। इसके बाद विद्वानों द्वारा तत्वचर्चा के उपरांत माता मरुदेवी द्वारा रात्रि में देखे गए 16 स्वप्नों के फल की जिज्ञासा महाराज नाभिराय से की गई, जिसके फलादेशों को महाराज नाभिराय द्वारा बताया गया।

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