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8वें तीर्थंकर भगवान चन्द्रप्रभ जी का गर्भ कल्याणक 8 मार्च को : तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन है


जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्र प्रभ जी का गर्भ कल्याणक रविवार यानी 8 मार्च को संपूर्ण देश के दिगंबर जैन मंदिरों में आस्था, श्रद्धा और भक्ति सहित आराधना करते हुए मनाया जा रहा है। भगवान का गर्भ कल्याणक तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण पंचमी को आता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में आज पढ़िए उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्र प्रभ जी का गर्भ कल्याणक रविवार यानी 8 मार्च को संपूर्ण देश के दिगंबर जैन मंदिरों में आस्था, श्रद्धा और भक्ति सहित आराधना करते हुए मनाया जा रहा है। भगवान का गर्भ कल्याणक तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण पंचमी को आता है। दिगंबर जैन मंदिरों में श्रावक-श्राविकाएं भगवान का महा मस्तकाभिषेक और शांतिधारा कर देश में प्रेम, सौहार्द और शांति की कामना करते हैं। भगवान चन्द्रप्रभ जी जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर हैं। उनके जीवन के पाँचों कल्याणक (गर्भ, जन्म, दीक्षा, ज्ञान और मोक्ष) अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। ‘गर्भ कल्याणक’ वह पावन क्षण है जब एक तीर्थंकर की आत्मा स्वर्ग से च्युत होकर माता के गर्भ में अवतरित होती है। तीर्थंकर बनने से पूर्व भगवान चन्द्रप्रभ की आत्मा धातकखंड के ‘मंगलावती’ देश की ‘रत्नपुर’ नगरी के राजा पद्मनाभ थे। उन्होंने कठोर तपस्या और सोलहकारण भावनाओं का चिंतन कर ‘तीर्थंकर प्रकृति’ का बंध किया। देह त्याग कर वे विजयंत विमान (स्वर्ग) में अहमिन्द्र देव बने।

माता-पिता और वंश

चंद्रपुरी (वाराणसी के पास) के इक्ष्वाकु वंशीय राजा महासेन का शासन अत्यंत न्यायप्रिय था। उनकी रानी का नाम लक्ष्मणा देवी था। जब भगवान के अवतरण का समय निकट आया, तो इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने रत्नपुर नगरी की रचना की और माता के आँगन में प्रतिदिन रत्नों की वर्षा शुरू कर दी।

माता के सोलह स्वप्न

चैत्र कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को रानी लक्ष्मणा ने रात्रि के अंतिम प्रहर में 16 शुभ स्वप्न देखे। जैन आगमों के अनुसार ये स्वप्न इस बात का संकेत थे कि एक महान तीर्थंकर का जन्म होने वाला है:

ऐरावत हाथी ,सफेद बैल ,सिंह , लक्ष्मी देवी ,फूलों की माला ,पूर्ण चंद्रमा ,सूर्य ,कलश ,मछलियों का जोड़ा , सरोवर ,समुद्र ,सिंहासन , देव विमान ,नागेंद्र का भवन,रत्नों की राशि, निर्धूम (बिना धुएँ की) अग्नि।

इंद्र का आगमन और उत्सव की शुरुआत

अगली सुबह राजा महासेन ने स्वप्न शास्त्र के आधार पर बताया कि उनके घर त्रिलोकपति तीर्थंकर का जन्म होगा। स्वर्ग से इंद्र और देवों ने आकर माता-पिता की स्तुति की और इसे ‘गर्भ कल्याणक’ उत्सव के रूप में मनाया।

प्राचीन काल की बात है कि महाराज महासेन अपनी प्रजा की सेवा में लीन थे, लेकिन उनके मन में एक गहरी आध्यात्मिक शांति की प्रतीक्षा थी। एक रात रानी लक्ष्मणा ने जब वे 16 स्वप्न देखे तो उन्हें लगा जैसे पूरा ब्रह्मांड संगीत से भर गया है।

रानी ने राजा से पूछा, “हे स्वामी! इन स्वप्नों का क्या अर्थ है? मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे मेरे भीतर साक्षात् करुणा और शांति का वास होने वाला है।”

राजा ने मुस्कुराकर कहा, “देवी! आपके गर्भ में वह महान आत्मा आई है, जो संसार के जीवों को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करेगी। वह चन्द्रमा के समान शीतल होंगे।” भगवान के गर्भ में आते ही पूरी सृष्टि में एक अनोखा परिवर्तन हुआ। पशुओं में बैर भाव समाप्त हो गया, युद्ध रुक गए और चारों ओर प्रेम की वर्षा होने लगी। चूँकि माता को गर्भावस्था के दौरान चंद्रमा (शशि) के समान उज्ज्वल आभा को देखने और चंद्रमा जैसी शीतलता की अभिलाषा (दोहद) हुई थी, इसलिए बाद में उनका नाम ‘चन्द्रप्रभ’ रखा गया।

गर्भ कल्याणक का आध्यात्मिक महत्व

अहिंसा का प्रसार: तीर्थंकर के गर्भ में आते ही तीन लोक में सुख की लहर दौड़ जाती है।

पवित्रता: तीर्थंकर की माता का शरीर देवों द्वारा शुद्ध किया जाता है।

चिह्न: भगवान चन्द्रप्रभ जी का प्रतीक चिह्न चंद्रमा है, जो शांति और समता का प्रतीक है।

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