महरौनी में दसलक्षण महापर्व की शुरुआत श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में हुई। मुनि श्री गुरुदत्त सागर ने क्षमा धर्म को जीवन की आधारशिला बताया और क्रोध त्यागने का संदेश दिया। मुनि श्री मेघदत्त सागर ने कहा कि क्षमा से रिश्तों में सुधार और आध्यात्मिक प्रगति संभव है। पढ़िए राजीव सिंघई की पूरी रिपोर्ट…
महरौनी (ललितपुर) के श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री निर्भय सागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागर एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर के सानिध्य में दसलक्षण महापर्व का शुभारंभ हुआ।
प्रथम दिन अभिषेक, शांति धारा और सामूहिक पूजन के बाद मुनि श्री गुरुदत्त सागर ने क्षमा धर्म पर प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि क्षमा का अर्थ केवल मांगना नहीं बल्कि जीवन में अपनाना है। क्षमा से व्यक्ति क्रोध और द्वेष से दूर होकर सभी प्राणियों के प्रति करुणा और प्रेम का भाव रखता है, जिससे आत्मिक शांति और सुख प्राप्त होता है। मुनि श्री मेघदत्त सागर ने कहा कि क्षमा धर्म जैन दर्शन का मूल सिद्धांत है। इसके पालन से मनुष्य को आंतरिक शक्ति और आध्यात्मिक विकास मिलता है। क्षमा से रिश्तों में सुधार होता है और यह मोक्ष मार्ग का द्वार खोलती है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही और सभी ने क्षमा धर्म के महत्व को आत्मसात करने का संकल्प लिया।













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