अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने गुप्ति सदन, कालानी नगर दिगम्बर जैन मंदिर में प्रवचन देते हुए कहा कि हमें साधुओं की वंदना संत और पंथ देखकर नहीं करनी चाहिए क्योंकि सभी साधु 28 मूल गुणों का पालन करते हैं। यह अलग बात है कि सहन शक्ति के अनुसार वे उपवास, त्याग और साधना अलग- अलग कर सकते हैं। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। केवलज्ञानी की अपेक्षा संसार में सभी अज्ञानी हैं। वर्तमान में साक्षात तीर्थंकर के दर्शन नहीं होते और न ही तीर्थंकरों की दिव्य ध्वनि सुनने को मिलती है। हम शास्त्र को पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ाकर धर्म की क्रिया करते हैं लेकिन वर्तमान में दिगंबर साधुओं के दर्शन होते हैं। उनकी वंदना, सेवा करने से हम पाप कर्म का नाश कर सकते हैं।

यह बात अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने गुप्ति सदन, कालानी नगर दिगम्बर जैन मंदिर में प्रवचन देते हुए कही। उन्होंने कहा कि हमें साधुओं की वंदना संत और पंथ देखकर नहीं करनी चाहिए क्योंकि सभी साधु 28 मूल गुणों का पालन करते हैं। यह अलग बात है कि सहन शक्ति के अनुसार वे उपवास, त्याग और साधना अलग- अलग कर सकते हैं। मुनि श्री ने कहा कि संसार का प्रत्येक जीव अपने कर्मों से बंधा है। इसलिए कभी किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए बल्कि उनके ज्ञान, चारित्र की उपासना करनी चाहिए।

भगवान महावीर ने मरीचि के भव में मिथ्या मत चलाए और वही अपने पापों का प्रायश्चित कर महावीर बन गए। इसलिए ध्यान रखना, कौन क्या कर रहा यह जानने की बजाय आप को क्या करना है और क्या कर रहे हो, इसका ध्यान रखना। आप दूसरों को निपटाने में लगे रहोगे तो कर्म आपको निपटा देगा। धर्म कहता है कि जो अपने कर्मों को देखता है, वही वास्तव में पुण्य का अर्जन कर एक दिन परमात्मा बन जाता है। कार्यक्रम में मंगलाचरण उषा पाटनी ने और संचालन ब्रह्मचारी पारस जैन ने किया।













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