दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -158 कभी किसी को कमतर न आंके : पहले स्वयं को जानो, फिर दूसरों को समझाओ


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 158वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


चतुराई सुवे पढ़ी, सोई पिंजर माहिं।

फिरि प्रमोघे आन कौ, आपन समझे नाहीं॥


कबीर कहते हैं — जैसे एक तोता (सुवा) चतुराई से रटी-रटाई बातें बोलता है,

लेकिन असल में वह पिंजरे में बंद रहता है —

उसी तरह आज का मनुष्य भी किताबों, तर्कों और दिखावे की चतुराई में तो माहिर हो गया है,

परंतु स्वयं की सच्ची पहचान — आत्मज्ञान — से दूर है।

वह दूसरों को मूर्ख समझता है,

पर अपनी ही अज्ञानता और अहंकार को नहीं देख पाता।

जैसे तोता केवल पढ़ी-पढ़ाई बातें दोहराता है,

पर उसमें न तो स्वतंत्र विचार होते हैं, न अनुभूत ज्ञान —

वैसे ही अगर कोई साधक केवल शास्त्रों, प्रवचनों या दूसरों की बातों को दोहराता है,

और स्वयं सत्य का अनुभव नहीं करता —

तो वह भी एक आध्यात्मिक पिंजरे में बंद है।

यह दोहा बाहरी दिखावे, डिग्रियों और चतुर भाषा पर एक तीखा व्यंग्य है।

आज लोग ज्ञान का मुखौटा पहनकर दूसरों को कमतर आंकते हैं,

लेकिन अपने भीतर की रिक्तता, भ्रम और अज्ञान को नहीं पहचानते।

आज का व्यक्ति दूसरों को उपदेश देता है,

खुद को ज्ञानी समझता है,

वाणी और शब्दों से प्रभाव जमाता है,

लेकिन भीतर से खोखला होता है।

वह केवल दिखावे का जीवन जीता है —

आत्म-निरीक्षण से डरता है,

और सत्य की ओर पीठ करके

ज्ञान का ढोंग रचता है।

कबीर यहाँ स्पष्ट चेतावनी देते हैं —

“पहले स्वयं को जानो, फिर दूसरों को समझाओ।”

 

कबीर का यह दोहा आज के समाज के लिए जागरण का शंखनाद है —

“केवल बोलने से ज्ञान नहीं आता।

अपने भीतर की कैद को तोड़ो —

वहीं सच्चा ज्ञान है।

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