मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचन सुनने के लिए जिनालयों में जैन समाज के श्रद्धालु मौजूद रहते हैं। मंगलवार को भी मुनिश्री ने अपने प्रवचन में जीवन दर्शन के संदेशों से जैन समाज के श्रावकों को लाभान्वित किया। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर…
सागर। जिस व्यक्ति ने तुम्हारी आंख के लिए ये गाली दे दी कि इसकी आंख फूट जाए ये घूर रहा है। उसी समय ये आंख तुम्हें अभिशाप देगी और तुम जन्म से ही अंधे पैदा होंगे यह प्रबोधन निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म सभा में दिया। उन्होंने कहा कि हमें वह शक्ति चाहिए, जो हमें कुछ देना चाहती हो, जो हमारे लिए जिए हमारे लिए सोचें, हमारे लिए कुछ कार्य करें। जो हमारे संबंध में चिंतित हो, ऐसी शक्ति को खोजना पड़ता है। उपकारी वह नहीं है जिससे उपकार हो रहा है।
सूर्य से उपकार हो रहा है
उपकार का अर्थ है- जो हमारा उपकार करता है। उपकार होना और उपकार करना दोनों में बहुत अंतर है, सूर्य, उपकार कर नहीं रहा है, सूर्य से उपकार हो रहा है। पानी उपकार कर नहीं रहा है, पानी से उपकार हो रहा है। जिनसे उपकार हो रहा है। उनके संबंध में हमें कोई विचार नहीं करना क्योंकि, वह तो हो रहा है, हमें उसका आभार मानने की जरूरत नहीं क्योंकि, वो तो उपकार करता है। हमें उस शक्ति खोजना है उस व्यक्ति को, जिससे उपकार होता नहीं है। वह उपकार करता है।
कर्म तो अपनी सजा देगा
जिसका काम मिटाना ही है। उससे हमें डरने की जरूरत नहीं क्योंकि, हम कितना ही डरेंगे वह तो मिटाएगा। हमें उससे बचना है जिसके द्वारा हम मिटेंगे नहीं, मिटायें जाएंगे। जो कर्म बांध लिया है। उससे डरने की जरूरत नहीं क्योंकि, वो कर्म तो अपनी सजा देगा। अपराध करने के बाद जेल से नहीं डरना क्योंकि जेल तो होगा ही होगा। अपराध करने के बाद जो भागता है। उस पर एक नई सजा और लगती है। भगोड़े की, इसलिए ज्ञानी व्यक्ति कहते हैं कि अपराध हो गया है तो भागो मत, सजा को स्वीकार करो। समर्पित हो जाओ क्योंकि, अब सजा तो मिलना ही मिलना है। अपराध करने के बाद अपराध से मुक्ति का एक ही उपाय है, सजा को स्वीकार करना।
तुम्हारी आत्मा में शक्ति जगाने वाली है
पहली बात तो तुम्हें अपराध से भागना चाहिए था कि अपराध होते नहीं है, अपराध किए जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति वही है जो अपराध से भागता है। जैसे ही आपके मन में पाप का भाव आता है तो क्या आपकी आत्मा कांप जाती है- ओहो मेरे में बहुत गंदा भाव आ गया और इतनी कांप जाए कि पश्चाताप की आग में भी जाने को तैयार हो जाये, समझ लेना तुम संसार से बहुत जल्दी तरने वाले हो। जब जब तुम्हारी आंख पाप देखने में काँप जाती है, समझ लेना तुम्हारी आत्मा में ही ऐसी शक्ति जगाने वाली है, जो तुम्हें आंखों से दिखता है, वह आंख बंद करने के बाद भी दिखना चालू हो जाएगा।
विचार करने का प्रयास करो…
इसी का नाम है दुर्दशित्व ऋद्धि। हर चीज को छोड़ने की होड़ मत करो, पहले यह मन मे बैठालों कि बुरा क्या है? यह विचार करने का प्रयास करो कि क्या नहीं देखना चाहिए। तुम्हें निर्णय करना है कि जो बुरा सामने आया है, उसको देखने में तुम्हे रुचि है और आंख खोल रहे हो तो समझ लेना तुम नेत्रहीन होने वाले हो क्योंकि, तुम उस चीज को देखने में रुचि लगा रहे हो, जिसे देखने के लिए मना किया गया है।
जो तुमसे छुप रहा है उसे झांककर मत देखना
पहली बार तो जो चीज देखने लायक नहीं है। उसका मन बना लो कि हम देखेंगे नहीं, हमारी दृष्टि झुकी हुई रहेगी क्योंकि, आप गृहस्थ हैं। कई बार नहीं देखने वाली चीजें भी देखनी पड़ती है तो कोई बात नहीं तुम एक नियम कर लो, जब सामने वाला नहीं चाहता है कि मैं देखूं, उसे मत देखना। जो तुमसे छुप रहा है, उसे झांककर मत देखना। मेरा उसको देखना मेरे परिवार को, समाज को, धर्म शास्त्र को भी अच्छा नहीं लगता, उसको मत देखना, ये एक नेत्र का बलात्कार है। मन का पापी, मन से बलात्कार करना- जो वस्तु हमारी नहीं है, जो हमारे लिए कोई इष्ट नहीं है।
आंख तुम्हें अभिशाप देगी
हम उस संबंध में सोच या देख रहे हैं, उसे नही देखेंगे। तुम्हारी आंखें अनमोल है फालतू नहीं है कि जिसे चाहे उसे देखें। हमारी तो वो आंख है कि लोग तरसे एक बार तो देख लेवें, आंख को इतना कीमती बनाओ। जिस व्यक्ति ने तुम्हारी आंख के लिए ये गाली दे दी कि इसकी आंख फूट जाए, ये घूर रहा हैं। महानुभाव उसी समय ये आंख तुम्हें अभिशाप देगी और तुम जन्म से ही अंधे पैदा होंगे। वो आंख क्या तुम्हारे पास आएगी, वो आंख तुम्हें इज्जत वाला मानकर आई थी कि तुम मुझे इज्जत दोगे।
एक ही नाम है वह है तीर्थंकर
इसी तरह अपने कानों को कीमती बनाओ कि हमें इनसे बुरा नहीं सुनेंगे। तुम्हारे भगवान है गुरु कुछ करते नहीं है लेकिन, अपनी बात उन तक पहुंचाना और तुम्हारे लिए अनुभव में आ गया कि अब कोई चिंता की बात नहीं। अब मरूं तो मर जाऊं, मेरी बात गुरु के कानों तक पहुंच गई। समझ लेना तुम्हारा अच्छा दिन चालू हो गया। ऐसी अनमोल बनाओ इस वाणी को, इस मुंह से जो चाहे मत निकालो, कोई यह बोल दे कि कहां क्या बक रहा है, समझ लेना गूंगे बनने की तैयारी हो गई और लोग तरस जाए कि इनके मुख से दो शब्द सुनने को हमे मिल जाए, ऐसी साधना बनाओ कि जब नगर में प्रवेश हो सारे नगर में खुशहाली छा जाए। जो देना चाहता है उसी से लेना है, जो मेरे संबंध में कुछ सोचता है वही मेरे काम आने वाला है, दुनिया में ऐसा कौन व्यक्ति है जिसने तुम्हारे लिए सोचा हो, उसका एक ही नाम है वह है तीर्थंकर। हम क्यों मनाते हैं इनके पंचकल्याणक क्योंकि उन्होंने एक ही बात की थी कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं सारे जगत को सुखी देखना चाहता हूं।













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