मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों विहार के दौरान नित धर्मसभाओं को संबोधित करते हुए चल रहे हैं। पृथ्वीपुर में उन्होंने धर्मसभा में प्रवचन दिए। उनके दिव्य प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में जैन श्रावक-श्राविकाएं आ रहे हैं। पृथ्वीपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई/ शुभम जैन की यह खबर…
पृथ्वीपुर। मुनिश्री सुधासागर जी ने यहां धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपस्थित जैन समाज के श्रद्धालुओं और गुरु भक्तों को अभाव और सद्भाव के बीच के अंतर को समझाया। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति वह है जो सद्भाव में सद्भाव की अनुभूति करता है, जो उनके पास है, वह उनके अनुभव में आता है, ऐसे होते है- मुक्त आत्माएं, शुद्ध आत्माएं, सिद्ध आत्माएं। दूसरे व्यक्ति वह होते हैं जो अभाव में अभाव की अनुभूति करते हैं, उनके पास कुछ नहीं है, उनको सदा अभाव की अनुभूति होती रहती है। तीसरे व्यक्ति वो है, जिन्हें सद्भाव में अभाव की अनुभूति होती है। सब कुछ उनके पास है लेकिन, उन्हें अनुभव में कुछ भी नहीं आ रहा है। चौथे नंबर का व्यक्ति वह है जो अभाव में सद्भाव की जिंदगी जीता है।
जब अभाव में सद्भाव की अनुभूति हो समझो साधु बनने लायक हो
कुछ भी नहीं है उसके पास, फिर भी वो संसार सबसे बड़ा बादशाह बनकर जीता है। जिन्हें साधु या साधक बोलते है। फकीर होकर भी सारे जगत का मसीहा बन गया, सबकुछ छोड़ कर भी सब कुछ पा गया। सारा जगत उसके पास नहीं है, छोड़ दिया लेकिन, सारा जगत उसके पीछे चल रहा है। जब तुम्हें अभाव में सद्भाव की अनुभूति हो जाए, समझ लेना तुम साधु बनने लायक हो।
तुम्हें भगवान दिख जाए, यही तो चमत्कार है
लोग पूछते हैं कि मैं व्रत कैसे लूं? मैं साधु कैसे बनूँ, कुछ नहीं अभाव में सद्भाव की अनुभूति करो, जो तुम्हारे पास नहीं है उसका आनंद लो। उपवास के दिन ऐसा आनंद आवे- जो खाने वालों को भी आनंद न आए, बस उपवास के दिन आनंद आए। एक शिल्पी ने एक पत्थर को उठाया और कहा कि मुझे इसमें मूर्ति की अनुभूति हो रही है, यह अभाव में सद्भाव की अनुभूति है। जब भगवान नहीं है और तुम्हें भगवान दिख जाए, यही तो चमत्कार है। दुनिया कहती है अग्नि की भट्टी है लेकिन साधना का चमत्कार होता है, सति सीता तो सरोवर में कमल के ऊपर बैठी है।













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