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उपवास जरूरी नहीं संस्कार और संस्कृति का पालन जरूरी है: आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने पर्वों के माध्यम से संस्कार और संस्कृति की शूचिता पर दिया जोर 


रामगंजमंडी। जिनमें आत्मा धर्म से जुड़ती है नैतिकता से जुड़ती है, कर्तव्यों से जुड़ती है, समीचीन क्रियाओं से जुड़ती है। वह पर्व कहलाता है। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए पर्व का महत्व बताया। रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर…


रामगंजमंडी। जिनमें आत्मा धर्म से जुड़ती है नैतिकता से जुड़ती है, कर्तव्यों से जुड़ती है, समीचीन क्रियाओं से जुड़ती है। वह पर्व कहलाता है। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए पर्व का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि हमें मन की सफाई करना चाहिए। मन में जो कुछ अशुभ विकल्प हैं उन्हें निकालना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन कहता है कि सुधार घर की रसोई से शुरू होता है। आचार्य श्री ने कहा भूखे रहने के लिए पर्व नहीं होता पर्व धर्म से जुडने के लिए होता है। एकासन एक समय भोजन इसलिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि कि आरंभ-सारंभ से दूर रहकर धर्म से जुड़ा जाए। उन्होंने कहा कि कितने भी वैज्ञानिक आविष्कार कितनी भी आधुनिकता इस संसार में छा जाए, कितनी भी भौतिकवाद सुविधाएं आपको मिल जाएं यह धर्म से अलग नहीं कर सकती। हम पर्वों पर ध्यान दें। पर्वों को मनाने के तरीकों पर ध्यान दें। धर्म से जुड़ने के लिए पर्व मनाएं तो कोई भी ताकत आपको धर्म से दूर नहीं कर सकती।

 मनोरंजन के दिन नहीं साधना के तपस्या के दिन आ रहे

आचार्य श्री ने कहा कि नैतिकता बहुत बड़ी चीज होती है कि नित्य नियम में हम क्या कर रहे हैं। आपकी दिनचर्या में यदि प्रतिदिन धर्म है तो हर दिन आपके लिए पर्व है। 365 दिन आपके लिए पर्व हो सकते हैं। अच्छा सोचना, अच्छा बोलना, अच्छा करना 365 दिन आप विशुद्धी बढ़ाएं तो इन पर्वों की आपको जरूरत ही नहीं पड़ेगी। उन्होंने कहा कि सफाई करें रसोई की और मन की। यही हमारी संस्कृति है हमारे संस्कार हैं। उन्होंने कहा पर्व के पहले यह भूमिका बनानी चाहिए कि रसोई की सफाई और मन की सफाई हो। यह मनोरंजन के दिन नहीं आ रहे हैं। यह पर्व साधना के तपस्या के दिन आ रहे हैं। जरूरी नहीं है कि आप उपवास करके तपस्या करें अच्छा सोचे, अच्छा बोले, अच्छा करे तो इस पंचम काल में बड़ी तपस्या है। आप यह प्रतिज्ञा कर ले बुरा ना सोचेंगे, बुरा ना बोलेंगे और बुरा न करेंगे उपवास जरूरी नहीं है संस्कार और संस्कृति का पालन करना जरूरी है। यह पालन आप सब सही तरीके से कर ले तो आप पर्व मना रहे हैं या आप पर्व मनाने के लिए तैयार हैं। यदि हम चिंतन करते रहते हैं तो अशुभ से हमारा विकल्प छूट सकता है। ग्रहण करने वाला चिंतन नहीं छोड़ने वाला चिंतन करना है। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के आहारचर्या एवं चरण वंदना का सौभाग्य कमल कुमार रजत लुहाड़िया परिवार को प्राप्त हुआ।

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