पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का चातुर्मास नगर में चल रहा हैं। यहां पर हो रही नित पूजन, विधान और अभिषेक के बाद मुनिश्री सर्वार्थ सागरजी के प्रवचन प्रवचन भी हो रहे है। जिसमें वे धर्म और ज्ञान के बारे में समाजजनों को जाग्रत कर रहे हैं। पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…
पथरिया। पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का चातुर्मास नगर में चल रहा हैं। यहां पर हो रही नित पूजन, विधान और अभिषेक के बाद मुनिश्री सर्वार्थ सागरजी के प्रवचन प्रवचन भी हो रहे है। जिसमें वे धर्म और ज्ञान के बारे में समाजजनों को जाग्रत कर रहे हैं। बुधवार को उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि हर चीज़ जब सीमा में होती है, तभी सुंदर लगती है, प्रेम भी, दूरी भी। हम जीवन में अक्सर सोचते हैं कि अधिक देना, अधिक जताना, अधिक समर्पण ही सच्चा प्रेम है लेकिन, जो ‘अधिक’ होता है, वही अक्सर ‘अगंभीर’ भी हो जाता है। प्रेम अगर हर पल जताया जाए, तो वह आदत बन जाता है, भावना नहीं। दूरी अगर हर समय बनी रहे, तो वह तड़प बन जाती है, अपनापन नहीं। संतुलन ही जीवन का धर्म है। जल यदि सीमित हो तो जीवन देता है और यदि सीमा तोड़ दे तो बाढ़ बन जाता है। मुनिश्री ने कहा कि प्रेम यदि सीमित हो तो पोषण देता है, लेकिन जब वह ‘स्व’ को मिटा दे, तो आत्म-तोड़ बन जाता है।
इसलिए, रिश्तों में थोड़ा मौन भी ज़रूरी है, थोड़ा ठहराव भी। प्रेम में थोड़ा संयम भी ज़रूरी है, थोड़ा इंतज़ार भी और दूरी में भी एक मिठास है, बशर्ते वह दूरी ‘अलगाव’ न होकर ‘आत्मिक जुड़ाव’ की परीक्षा हो। उन्होंने कहा कि जीवन में वही टिकता है, जो थमता है। हर चीज़ की अपनी सीमा है। चाहे वह सूरज की गर्मी हो, बारिश की बूँदें हों, या फिर किसी का प्यार।













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