इंदौर के उदयनगर में विराजमान आचार्य श्री आर्जव सागरजी ने सम्यक ध्यान प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत दिगंबर जैन धर्म, ध्यान एवं आत्म साक्षात्कार के विषयों पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने अपने प्रवचन में बताया कि हर कार्य के लिए चार प्रमुख तत्वों द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का सामंजस्य होना आवश्यक है। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर…
इंदौर। इंदौर के उदयनगर में विराजमान आचार्य श्री आर्जव सागर ने सम्यक ध्यान प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत दिगंबर जैन धर्म, ध्यान एवं आत्म साक्षात्कार के विषयों पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने अपने प्रवचन में बताया कि हर कार्य के लिए चार प्रमुख तत्वों द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का सामंजस्य होना आवश्यक है। उदाहरण स्वरूप उन्होंने स्पष्ट किया कि भोजन करना केवल अन्न ग्रहण नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसमें द्रव्य (शुद्ध आहार), प्रकाश, क्षेत्र (पर्यावरण), काल (सूर्याेदय से सूर्यास्त के पूर्व), और भाव (शुद्ध चित्त) का सम्मिलित होना चाहिए। केवल स्वाद नहीं, बल्कि परोसने से लेकर पाचन तक यदि उमंग, स्फूर्ति और शुभ भावना हो, तो वही भोजन, ध्यान और साधना का आधार बन सकता है। अन्यथा शुद्ध भाव के अभाव में भोजन भी नकारात्मक ऊर्जा का माध्यम बन सकता है। स्वप्निल जैन ने बताया कि आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ससंघ 2025 के चातुर्मास हेतु उदय नगर में विराजमान हैं। उन्होंने बताया कि ध्यान एक निरंतर प्रक्रिया है। ध्यान के 16 प्रकार के भेद बताए गए हैं। इनमें से हमारे मन में कोई न कोई ध्यान हर समय चलता रहता है।
ध्यान के लिए जो आवश्यक हैं उनमें ध्याता (ध्यान करने वाला), ध्येय (ध्यान का विषय), इनके आश्रय से हमारा शुभ-अशुभ ध्यान चलता रहता है। उन्होंने आगे कहा कि शुक्ल ध्यान आज के पंचम काल में संभव नहीं है। हमारा प्रयास होना चाहिए कि हमें हर पल शुभ का चिंतन करने का भाव रखना होगा क्योंकि, यदि अशुभ ध्यान आर्तध्यान, रौद्र ध्यान आदि करेंगे तो निश्चित रूप से अधोगति में जाना पड़ेगा। अतः बंधुओं धर्म ध्यान में अपने मन को लगाओ और जीवन को महान बनाओ।













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