समाचार

आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का महाप्रयाण : कविता से दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि

विकास कासलीवाल, कोलकाता ने कविता के माध्यम से दी है आचार्य श्री को विनम्र श्रद्धांजलि

हो अर्द्ध निशा का सन्नाटा, जग के सब प्राणी सोते हो,

तब शान्त निराकुल मानस तुम, मुक्ति के पथ पर बढ़ते हो..!!

युग दृष्टा ब्रहमांड के देवता विश्ववंदनिय इस घरती के चलते फिरते भगवान राष्ट्रहित चिंतक संतशिरोमणि जिन सूर्य परम पूज्य हृदयस्पर्शी गुरुदेव 108 आचार्य भगवंत गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाऋषिराज ने पूरी जागृत अवस्था में विधिवत सल्लेखना बुद्धिपूर्वक धारण कर नश्वर देह का डोंगरगढ़, चंद्रगिरी तीर्थ पर त्याग कर दिया वे सभी धर्म संप्रदायों में अत्यंत लोकप्रिय महान संत थे।

हम सभी के असाता वेदनीय कर्म के तीव्र उदय से हम सबके भगवान आचार्य भगवंत गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाऋषिराज तीव्र कर्मोदय की वेदना को सहन करते हुए तीन दिन के उपवास पूर्वक इस रत्नत्रयमयी दिव्य देह को छोड़कर सदा सदा के लिए अमर हो गए।

वो एक एहसास थे, वो प्रकाश थे, वो दूर जाकर भी मेरे पास है, अंतस की प्यास है, प्रयास है, इस जन्म नहीं, कभी तो उन जैसा बन जाऊं यही मेरे मन की आस है।

युग पुरुष आते युगों में, युग बदलने के लिए,

छोड़ते पदचिन्ह, पदचिन्हों पर चलने के लिए..

एक अनुरोध:

आचार्य विद्यासागर एक्सप्रेस के नाम से ट्रेन का नामकरण हो।

आचार्य विद्यासागर के नाम से विद्यालयों व् सड़कों का नाम हो।

सरकार आचार्य श्री को भारत रत्न की उपधि से सम्मानित कर सम्पूर्ण जैन समाज को सम्मानित करे।

ॐ नमः सिद्धेभ्य:

नमन विद्या के सागर आप श्री के पावन श्रीचरणों मे त्रिकाल बारंबार कोटिश: नमोस्तु: नमोस्तु: नमोस्तु:

विन्रम विनयांजलि

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
2
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page