दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 159वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
ज्ञानी मूल गंवाइया, आपन भए करन।
तातें संसारी भला, मन मंहि रहे डरन॥
इस दोहे में कबीर दास अहंकारजन्य ज्ञान की तीव्र निंदा कर रहे हैं।
वे कहते हैं —
जो व्यक्ति अपने को ज्ञानी मानकर यह सोचता है कि “मैं ही जानता हूँ, मैं ही करता हूँ, मैं ही मार्गदर्शक हूँ,”
वह अपने ज्ञान के मूल उद्देश्य को खो देता है।
ऐसा ज्ञानी वास्तव में ज्ञान के भ्रम में डूब जाता है,
और उसकी विद्वता उसे ईश्वर से दूर कर देती है।
इसके विपरीत,
एक साधारण संसारी व्यक्ति —
जो अपने आचरण में सजग है,
जो गलत करने से डरता है,
जो विनम्र भाव से जीवन जीता है —
वह उस अहंकारी ज्ञानी से कहीं श्रेष्ठ है।
कबीर यहां स्पष्ट करते हैं कि
धर्म का सार है — भक्ति, नम्रता और आत्मसमर्पण।
लेकिन जब कोई पंडित, विद्वान, कथावाचक या साधु
अपने ज्ञान, पद, योग्यता या बुद्धिमत्ता को लेकर
अहंकार करने लगता है —
और स्वयं को ही धर्म का केंद्र मान बैठता है,
तब उसका धर्म, अधर्म में बदल जाता है।
इसलिए कबीर कहते हैं —
वह व्यक्ति जो साधारण पूजा करता है, लेकिन विनम्र और भयभक्त है,
वह ईश्वर के अधिक समीप है।
आज के समाज में
जो लोग अपने ज्ञान और उपलब्धियों पर गर्व करते हैं,
जो दूसरों को तुच्छ समझते हैं,
जो उपदेश तो देते हैं,
लेकिन अपने जीवन में विनम्रता और अनुशासन नहीं रखते —
वे समाज के लिए वास्तविक आदर्श नहीं हैं।
समाज को ऐसे अहंकारी ज्ञानी नहीं,
बल्कि विवेकशील, विनम्र और आत्मानुशासित लोग चाहिए।
वह आम इंसान,
जो अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाता है,
जो पाप-पुण्य के प्रति सजग है,
जो बड़ों का आदर करता है —
वही समाज के लिए सच्चा नागरिक और धार्मिक व्यक्ति है।
**कबीर अंत में चेतावनी देते हैं —
“जो ज्ञान विनम्र न बनाए, वह अज्ञान से भी अधिक खतरनाक है।”
यह दोहा ज्ञान के नाम पर उपजे अहंकार को तोड़ने का मंत्र है —
और सच्चे धर्म का दर्पण।













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