श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, अंजनी नगर की ओर से आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी दीक्षित एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से शिक्षित अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज की तीन दिवसीय विशेष प्रवचन माला के आखिरी दिन अंजनी नगर के पार्श्व संत सदन में संत और पंथ के नाम पर नहीं, धर्म के नाम पर कल्याण विषय पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री ने कहा कि आज हम पंथवाद और संतवाद में इतने उलझ गए हैं कि मां जिनवाणी को ही भूल गए हैं। शास्त्र के अनुसार नहीं चल रहे हैं। शास्त्र के श्लोक, गाथा का अर्थ हम अपनी मान्यता के अनुसार निकाल रहे हैं। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट….
इंदौर। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, अंजनी नगर की ओर से आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी दीक्षित एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से शिक्षित अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज की तीन दिवसीय विशेष प्रवचन माला के अंतिम दिन अंजनी नगर के पार्श्व संत सदन में संत और पंथ के नाम पर नहीं, धर्म के नाम पर कल्याण विषय पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री ने कहा कि जैन सिद्धांत कहता है कि शरीर और आत्मा अलग हैं। संसार में यह दोनों कर्म के कारण एकमेव हैं। धर्म के माध्यम से ही इन्हें अलग किया जा सकता है। शुभ और अशुभ कर्म के नाश से आत्मा और शरीर अलग-अलग होंगे। उन्होंने कहा कि आज हम पंथवाद और संतवाद में इतने उलझ गए हैं कि मां जिनवाणी को ही भूल गए हैं। शास्त्र के अनुसार नहीं चल रहे हैं। शास्त्र के श्लोक, गाथा का अर्थ हम अपनी मान्यता के अनुसार निकाल रहे हैं। इसी वजह से जैन धर्म इतने भागों में बंट गया है कि अब भगवान महावीर की जय बोलने वाले तो कम हो गए हैं, संतवाद और पंथवाद की जय बोलने वाले काफी बढ़ चुके हैं।

धर्म की हो रही अप्रभावना
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य का कल्याण पंथ और संतवाद से नहीं होगा, बल्कि इससे तो समाज, परिवार में बंटवारा हो रहा है। धर्म की अप्रभावना हो रही है। समाज के लोग आपस में लड़ कर समाज, मंदिर के वातावरण को दूषित कर रहे हैं। इन्हीं कारणों से आज हमारे तीर्थ, शास्त्र और गुरु सुरक्षित नहीं रह गए हैं । जो धर्म आत्म कल्याण का साधन था, उसे ही हमने अपने अहंकार में आकर अशुभ कर्म का कारण बना लिया है।

पाप है व्यक्ति विशेष की पूजा
मुनि पूज्य सागर के मुताबिक, जैन सिद्धांत कहता है कि व्यक्ति विशेष की पूजा पाप है, दुख का कारण है। शास्त्रों में व्यक्ति नहीं, गुणों की पूजा करने को कहा गया है। नाम में कुछ नहीं रखा। कर्म की निर्जरा और समाज में शांति, समृद्धि, विकास और भाईचारा तभी आएगा, जब गुणों के आधार पर हम पूजन करेंगे। तभी आत्मा का ज्ञान होगा, तभी आत्मा कर्म से अलग होगी। णमोकार मंत्र में संसार के सभी अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु को नमस्कार किया गया है बिना भेदभाव के तो फिर है क्यों संतवाद और पंथवाद समाज में पनप रहे हैं।

श्रावकों को भटकाना बंद करें
उन्होंने कहा कि भगवान आदिनाथ के समय में उनके साथ दीक्षित कई साधुओं ने दीक्षा छोड़ दी और उनके स्वयं के पोते मरीचि ने भी अनेक मिथ्यामत उनके सामने चलाए। आप सभी विचार करना कि आदिनाथ भगवान भी अपने पोते को गलत मार्ग पर जाने से नहीं रोक सके। उसने अपने कर्म के अनुसार फल भोगा। न तो पंथवाद काम आया और न ही संतवाद। जो संतवाद और पंथवाद पर विवाद करना चाहता है, समाज को तोड़ना चाहता है तो वह दुर्गति का पात्र ही बनेगा। केवली भगवान के अलावा कोई इस संसार में नहीं यह बता सकता कि किसका चरित्र निर्मल है और किसका निर्मल नहीं, तो क्यों संत और समाज के कुछ लोग श्रावकों को धर्म के मार्ग से भटका रहे हैं। आज हम वैसे ही कम हैं और इन वापसी विवादों में पड़कर आपस में लड़कर धर्म की अप्रभावना कर रहे हैं। संतवाद और पंथवाद के कारण समाज कई भागों में विभक्त हो गया है। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो समाज संतों के नाम से बंट जाएगा। यह हो जाएगा कि फलां लोग इस संत के अनुयायी हैं और फलां उस संत के।
स्मृति नगर के लिए करेंगे विहार
इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन सोमाचंद जैन, देवेन्द्र सोगानी ,मांगीलाल बाकलीवाल और मंगलाचरण से हुई। मंगलाचरण सपना जैन-मनोज जैन ने किया। पाद प्रक्षालन समाज के अध्यक्ष देवेंद्र सोगानी, सोमचंद्र जैन और नितिन पाटोदी ने किया। शास्त्र भेंट मुनि श्री की गृहस्थ अवस्था की माता विमला जैन ने किया। धर्म सभा का संचालन समाज के उपाध्यक्ष ऋषभ पाटनी ने किया। आभार नितिन पाटोदी ने व्यक्त किया। सभा में सकल जैन समाज के लोग मौजूद रहे। समाज के विशेष निवेदन पर आज और मुनि श्री के प्रवचन अंजनी नगर में होंगे और इसके बाद वह दोपहर में स्मृति नगर के लिए विहार करेंगे।













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