श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान जैन साध्वी विश्रेय श्री माताजी ने प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं से कहा कि धर्म के मूल तत्व को समझे बिना जो भी कार्य किया जाता है, वह पुण्य की जगह पाप का कारण बन जाता है। साध्वी श्री ने कहा कि मनुष्य परिवार, पत्नी, बेटा आदि के नाम पर तमाम पाप कर्म करता है परंतु वह भूल जाता है कि इस पाप का फल उसे अकेले भुगतान पड़ता है। पढ़िए अजय जैन की रिपोर्ट…
अम्बाह। श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान जैन साध्वी विश्रेय श्री माताजी ने प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं से कहा कि धर्म के मूल तत्व को समझे बिना जो भी कार्य किया जाता है, वह पुण्य की जगह पाप का कारण बन जाता है। साध्वी श्री ने कहा कि मनुष्य परिवार, पत्नी, बेटा आदि के नाम पर तमाम पाप कर्म करता है परंतु वह भूल जाता है कि इस पाप का फल उसे अकेले भुगतान पड़ता है। जैन साध्वी ने कहा कि मनुष्य संसार के जितने कार्य करता है, वह तो पत्नी, परिवार के साथ करता है जैसे घूमने जाना हो, फिल्म देखने जाना हो, पर धर्म का कार्य, अनुष्ठान हो तो वह सोचता है पत्नी कर लेगी। इसलिए तो आज मंदिरों में पुरुष से अधिक महिला दिखाई देती है। लेकिन जोड़े के साथ किया धर्म अनुष्ठान पूरे परिवार को सुख, शांति और समृद्ध बनाता है। धर्म के अनुसार विवाह भोग के लिए नहीं, धार्मिक अनुष्ठानों और गृहस्थ धर्म को बढ़ाने के लिए किया जाता है।
जैसा कर्म, वैसा फल
उन्होंने कहा कि विवाह के समय जो सात वचन देते और लेते हो, उनका स्मरण कर लेना तो विवाह का असली मतलब समझ मे आ जाएगा। धर्म ही मनुष्य के कर्मों का नाश करने और दु:ख से निकल कर उत्तम सुख को देने वाला है। भारतीय संस्कृति का इतिहास उठाकर देख लें, जिन्होंने जैसा कर्म किया, उसका फल उसे भोगना ही पड़ा है। फिर चाहे वह मानव रूप में धरती पर आए भगवान ही क्यों ना हों। कर्मबंध के चलते भगवान श्री राम को वनवास जाना पड़ा, सीता माता को भी सती होने के बाद भी गर्भ अवस्था में वन जाना पड़ा। पार्श्वनाथ भगवान को तो अपने ही भाई के द्वारा दस भव तक किए उपसर्ग को सहन करना पड़ा। जैन साध्वी ने कहा कि मानव को अब समझ जाना चाहिए कि संसारी कार्य जो भी हो वह धर्म के अनुसार ही करना चाहिए। हर कार्य में धर्म को साथ लेकर चलना चाहिए तभी वह कार्य सुख, शांति और समृद्धि का कारण होता है।
कषाय दुख का कारण
पूज्य माताजी ने कहा कि धर्म का कार्य कषाय आदि से रहित होता है और कषाय आदि ही दुख का कारण है। जब मनुष्य कर्म का बंध करता है तो उसे पता ही नहीं चलता है। जब उसका फल भोगता है तो उसे पता चलता है। शुभ-अशुभ कर्म का फल भोगते हैं तो उस समय यह मन में आना चाहिए कि यह सब मेरे पूर्व में किए कर्मों का फल है, किसी और को उसका जिम्मेदार नही बताना चाहिए। जिम्मेदार बताने से अधिक अशुभ कर्म का बन्ध होता हैं।













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