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भावनाओं का अनुशासन ही उन्नति का पथ प्रशस्त करता है : दुर्वलताओं पर अंकुश से जीवन का उद्धार संभव – मुनि श्री प्रमाण सागर”


भोपाल (अवधपुरी) में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने “भावनाओं का अनुशासन” विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि अनुशासित जीवन ही व्यक्ति को क्रोध, लोभ, मोह और भय से मुक्त करता है। उन्होंने उदाहरणों से समझाया कि भावनाओं पर नियंत्रण ही परिवार और समाज के संचालन का आधार है। पढ़िए राजीव सिंघई की ख़ास रिपोर्ट…


जैन संत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने सोमवार को “भावनाओं का अनुशासन” विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि जगत के सभी पदार्थ केवल संयोग मात्र हैं। अपेक्षा से मुक्त जीवन सहज, शुद्ध और शांत होता है। ऐसा जीवन न तो क्रोध, न लोभ, न मोह और न ही भय से प्रभावित होता है।

मुनि श्री ने बताया कि “अनुशासन विहीन प्रेम” संतान के विकास में बाधक बनता है। यदि भावनाओं पर अनुशासन हो, तो जीवन एक-दूसरे के लिए प्रेरणा और पूरक बन जाता है। अन्यथा मोह के बंधन में फंसकर व्यक्ति अपना जीवन व्यर्थ कर देता है।

उन्होंने उदाहरण स्वरूप महाभारत और रामायण की घटनाओं का उल्लेख किया। धृतराष्ट्र के मोह ने संपूर्ण वंश का नाश कर दिया, जबकि श्रीराम ने सीता हरण जैसी परिस्थिति में भी विवेक और अनुशासन से कार्य कर आदर्श शासन स्थापित किया और जगतपूज्य बने।

मुनि श्री ने कहा – “भावनाओं का अनुशासन जीवन का उद्धार करता है, जबकि वासना का आवेग व्यक्ति को अंधा बना देता है।” उन्होंने नदी का उदाहरण देते हुए बताया कि जब नदी तटबंधों में बहती है तो जीवन को संवारती है, लेकिन जब बंधन तोड़ती है तो बाढ़ लाकर विनाश कर देती है।

उन्होंने कहा कि जो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हैं और अनुशासन के साथ परिवार व समाज का संचालन करते हैं, वे उन्नति के शिखर तक पहुंचकर यश-कीर्ति की पताका फहराते हैं। भावनाओं की गहराई में क्षमा, दया, करुणा और वात्सल्य का निवास होता है, जबकि क्रोध, लोभ, मोह और भय से जीवन दूषित हो जाता है।

अन्न-जल ग्रहण कर तप की पूर्णाहुति की

मुनि श्री ने “भावनायोग” को दुर्वलताओं पर नियंत्रण का श्रेष्ठ साधन बताया। उनके अनुसार, नियमित अभ्यास से न केवल नकारात्मक भावनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है बल्कि उन्हें शक्ति में परिवर्तित भी किया जा सकता है। प्रवचन के उपरांत उपस्थितजनों को प्रयोगात्मक “भावनायोग” का अभ्यास कराया गया। वहीं, मुनि श्री संधान सागर महाराज ने भी अपनी तप साधना का परिचय देते हुए लगातार 24 घंटे एक ही आसन में ध्यानस्थ रहकर साधना की। 48 घंटे बाद उन्होंने अन्न-जल ग्रहण कर तप की पूर्णाहुति की। सभा का समापन मंगल भावना के साथ किया गया।

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