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देव शास्त्र गुरु शरण में भक्ति से पाप कर्मों की होती है निर्जरा : मुनि श्री पूज्य सागर जी ने कहा- गुरु भक्ति से होती है पुण्य की प्राप्ति 


अंतर्मुखी मुनिश्री 108 श्री पूज्य सागर जी महाराज ने आज अशरण भावना की विवेचना की। मुनिश्री पूज्यसागर जी ने बुधवार को दिगंबर जैन मंदिर परिवहन नगर में कहा कि देव शास्त्र गुरु चार मंगल नव देवता शरण हैं। शरण दाता सही राह दिखाते हैं। इंदौर से पढ़िए, यह खबर…


इंदौर। अंतर्मुखी मुनिश्री 108 श्री पूज्य सागर जी महाराज ने आज अशरण भावना की विवेचना की। मुनिश्री पूज्यसागर जी ने बुधवार को दिगंबर जैन मंदिर परिवहन नगर में कहा कि देव शास्त्र गुरु चार मंगल नव देवता शरण हैं। शरण दाता सही राह दिखाते हैं। सम्यक दर्शन और मिथ्या दर्शन का अंतर बताते हैं और हितकारी मंगलकारी हैं। शरीर से धर्म साधना, दान, तप, त्याग, संयम धारण किया जाता है। यही समझ सम्यक दर्शन है, समय सार हैं। पूज्य मुनिश्री ने कहा कि काल रूपी शेर ने मृग हिरण रूपी आत्मा को संसार रूपी वन में घेर रखा है।

देव शास्त्र गुरु शरण में भक्ति से पाप कर्मों की निर्जरा होकर पुण्य की प्राप्ति होती है। परिवहननगर द्वारकापुरी में अपना पूज्य वर्षायोग कर रहे अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागरजी महाराज की प्रवचन सभा में पोरवाड़ जैन समाज के अध्यक्ष नमिष जैन इंदौर ने उपस्थित होकर मुनि श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। बुधवार की धर्मसभा में बड़ी संख्या में दिगंबर जैन समाज के श्रद्धालु, गुरु भक्त और आस्थावान लोग मौजूद रहे।

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