टोंक में आयोजित धर्मसभा में आचार्य वर्धमान सागर जी महाराज ने उपदेश दिया कि देव, शास्त्र और गुरु की आराधना से पुण्य अर्जित होता है और पाप कर्मों का क्षय होता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जिनवाणी के स्थान पर जनवाणी प्रचलित हो गई है, जिसके कारण जीवन में दुख बढ़ा है। पढ़िए राजेश पंचोलिया की पूरी रिपोर्ट…
टोंक में धर्मसभा को संबोधित करते हुए पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि जिनालयों में देव, शास्त्र और गुरु की आराधना करने से पुण्य अर्जित होता है और पाप कर्मों का क्षय होता है। उन्होंने बताया कि भगवान ने हमें मोक्ष की राह दिखाई है, किंतु लोग भोग-विलास और कषायों की ओर बढ़ रहे हैं। यदि जीवन की दिशा बदली जाए तो दशा भी बदल सकती है और वास्तविक सुख प्राप्त हो सकता है।
आचार्य श्री ने कहा कि आजकल लोग पूजा-पाठ तो करते हैं, किंतु जिनवाणी का पालन नहीं करते। वर्तमान में जनवाणी प्रचलित हो गई है, जिसके कारण धर्म का सार खो रहा है। क्षमावाणी पर्व पर हमें जिनवाणी माता से क्षमा मांगकर पुनः जिनवाणी को जीवन में उतारना चाहिए। उन्होंने दस लक्षण धर्म पर चिंतन करने और इसे वर्षभर हर क्षण अपनाने का आह्वान किया।
प्रतिमा और ध्यान मंदिर निर्माण का संकल्प भी घोषित
धर्मसभा में उन्होंने प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की आचार्य पद प्रतिष्ठा शताब्दी महोत्सव में उनकी प्रतिमा और ध्यान मंदिर निर्माण का संकल्प भी घोषित किया और इसे जैन समाज का गौरव बताया। कार्यक्रम के पूर्व आर्यिका श्री दिव्य यशमति माताजी ने कथा के माध्यम से त्याग और दान का महत्व समझाया। श्री प्रमेय सागर भट्टारक ने आचार्य श्री सहित मुनियों और आर्यिकाओं से आशीर्वाद प्राप्त किया।
श्री आदिनाथ नसिया मंदिर में भगवान का अभिषेक भी संपन्न हुआ। इस अवसर पर चातुर्मास समिति और जैन समाज ने तीन, पाँच, दस, ग्यारह, सोलह और बत्तीस उपवास करने वाले तपस्वियों का भव्य स्वागत किया और अनुमोदना की। समाज ने इस धार्मिक आयोजन को टोंक की आध्यात्मिक गरिमा में वृद्धि करने वाला बताया।













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