पूज्य आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित होगा। भारतीय संस्कृति में श्रमण परम्परा के विकास में पूज्य आचार्य श्री का महत्वपूर्ण योगदान है। आचार्य महाराज के आशीर्वाद से विरागोदय तीर्थ पथरिया में विरागोदय महोत्सव आयोजित हुआ था। इस महामहोत्सव में देश के लाखों लोग सम्मलित होकर धर्म लाभ लेने का सौभाग्य प्राप्त किया था। पढ़िए डॉ. आशीष कुमार जैन, बम्हौरी, (असिस्टेंट प्रोफेसर), जैन और प्राकृत अध्ययन विभाग, एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह का विशेष आलेख
भारत वर्ष की पावन भूमि सदैव नर रत्नों की जन्म दात्री रही है, जहाँ पर तीर्थंकरों, यतिवरों तथा महापुरुषों ने जन्म लेकर पुरुषार्थ द्वारा, त्याग, तपस्या के माध्यम से अपना आत्म कल्याण किया। 20 वीं शताब्दी में आचार्य आदिसागर अंकलीकर ने धर्म की प्रभावना की, उसके बाद आचार्य महावीरकीर्ति महाराज ने ज्ञान ध्यान से इस भूमि को पवित्र किया, इसके बाद आचार्य विमलसागर जी महाराज, तपस्वी सम्राट् आचार्य सन्मतिसागर जी महाराज ने त्याग तपस्या करके जिन धर्म प्रभावना की, इस श्रृंखला में आचार्य श्री विरागसागर जी ने जन्म लेकर इस वसुंधरा को गौरवान्वित किया।
आपका जन्म भारत देश के मध्य प्रदेश प्रांत के जिला – दमोह के अंतर्गत पथरिया ग्राम में वैशाख शुक्ल 9 वि. सं. 2020 ( 2 मई 1963) को रात्रि 9ः00 बजे हुआ था। आपके पिता श्री मान सेठ कपूरचंद्र व माता श्री मति श्यामा देवी (वर्तमान में आपसे ही दीक्षित पूज्य क्षुल्लिका श्री विशांत श्री माता जी है)। आपका गृहस्थ अवस्था का नाम अरविन्द कुमार था। आप अपने माता-पिता की प्रथम संतान के रूप में थे। आपके तीन छोटे भाई श्री विजय जैन, श्री सुरेन्द्र जैन, श्री नरेन्द्र जैन। आपकी दो बहनें श्री मति मीना जैन, श्रीमान् बसंत जैन भाटिया नोहटा तथा श्री मति विमला जैन, श्री सुरेश जैन सागर में है। बालक अरविन्द जी ने कक्षा पांचवी तक की शिक्षा ग्राम पथरिया में ही प्राप्त की और आगे की पढ़ाई करने हेतु सन् 1974 में ग्यारह वर्ष की आयु में अपने माता-पिता से दूर कटनी आये। वहां पर श्री शांति निकेतन दिगम्बर जैन संस्था में ६ वर्ष तक धार्मिक तथा लौकिक शिक्षा ग्रहण की। लौकिक शिक्षा ग्यारहवीं तक पूर्ण की। साथ में शास्त्री की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। इस छह वर्ष की कालावधि में अनेक साधु-संतों का समागम प्राप्त हुआ, जो भावी जीवन की नीव डालने में साधनभूत हुआ।
आपके जन्म के 16 वर्ष 9 माह 18 दिन पश्चात् फा. शु. वि. सं. 2036 (20 फरवरी 1980) को परम पूज्य तपस्वी सम्राट् आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी से बुढ़ार मध्य प्रदेश में क्षुल्लक दीक्षा ली थी तब आपका नाम क्षुल्लक पूर्ण सागर रखा गया था।
3 वर्ष 9 माह 19 दिन क्षुल्लक अवस्था में रहकर पश्चात् मगसिर शु. वि. सं. 2040 (9.12.83) को परम पूज्य सन्मार्ग दिवाकर वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज के कर कमलों से मुनि दीक्षा ली तब आपका नाम मुनि श्री विराग सागर जी रखा गया। 8 वर्ष 10 माह 29 दिन मुनि अवस्था में रहकर पश्चात् शिष्यों के अनुग्रह-निग्रह में कुशल होने के कारण परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमलसागर जी महाराज की आज्ञानुसार कार्तिक शुक्ल 13 वि. सं. 2049 (08.11.1992) को सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरि में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया।
संक्षिप्त जानकारी
पूर्व नाम : श्री अरविन्द जैन
पिता : श्री कपूरचंद जी जैन (समाधिस्थ मुनि विश्ववंध सागर जी महाराज)
माता : श्रीमती श्यामादेवी जैन (समाधिस्थ आ.विशांत श्री माताजी)
जन्म : 2.5.1963, गुरुवार (वैशाख सुदी 9 वि.सं 2020)
जन्म स्थान : पथरिया (म.प्र.)
बहन : श्रीमती मीना जैन, श्रीमती विमला जैन
भाई : श्री विजय कुमार, श्री सुरेंद्र कुमार, बा.ब्र श्री नरेंद्र भैया जी
लौकिक शिक्षा : इण्टर, मध्यमा (पथरिया, श्री शांतिनिकेतन, दि.जैन संस्कृत विद्यालय, कटनी)
विवाह : बाल ब्रह्मचारी
क्षुल्लक दीक्षा : 20.2.1980, (फाल्गुन शु. 5 वि. सं. 2036)
क्षुल्लक दीक्षा स्थान : बुढ़ार, शहडोल
क्षुल्लक दीक्षा का नाम: पूज्य क्षुल्लक श्री 105 पूर्णसागर जी
क्षुल्लक दीक्षा गुरु : प.पू.तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी
मुनि दीक्षा : 9.12.1983,(मंगसर शु. 5 वि.सं.2040)
मुनि दीक्षा स्थान : औरंगाबाद
मुनि दीक्षा का नाम : प. पु. मुनि श्री 108 विरागसागर महाराज
मुनि दीक्षा गुरु : प. पु. आ. श्री 108 विमलसागर जी महाराज
आचार्य पद : 8.11.1992, द्रोणगिरि (कार्तिक शु. 13 वि.सं. 2049)
संयमी सर्जन : आचार्य – 9
मुनि : 93
गणिनी : 4
आर्यिका : 71
ऐलक : 5
क्षुल्लक : 25
क्षुल्लिका : 32
समाधि संलेखना : लगभग 133 एवं अनेक तिर्यंच प्राणी
साहित्य सृजन : 1.वारसाणुपेक्या पर 1100 पृष्ठीय सर्वोदयी संस्कृत टीका
2 रयणसार पर 800 पृष्ठीय रत्नत्रयवर्धिनी संस्कृत टीका
3. लिंग पाहुड पर श्रमण प्रबोधनी टीका
4. शील पाहुड पर श्रमण सम्बोधनी टीका
5. शास्त्र सार समुच्चय पर चूर्णी सूत्र
अनेक शोधात्मक साहित्य – (शुद्धोपयोग, सम्यक्दर्शन, आगमचक्खू साहू आदि), चिन्तनीय बालकोपयोगी कथा अनुवाद गद्य संपादित साहित्य, जीवनी एवं प्रवचन साहित्य 150 से अधिक पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं।
धार्मिक रुचि : -जिनदर्शन, पूजन, स्वाध्याय, गुरु सेवा एवं असहाय, असर्मथों के लिए सहयोग।
अनोखा खेल : छोटी आयु (मात्र 4 वर्ष) में गंजी पहने एक हाथ में झाडू व एक हाथ में लोटा लेकर क्षुल्लकजी का खेल खेलते थे, जिसे आगे सार्थक भी किया।
दाऊ भैया : बच्चों में सुलह कराने व छोटे भाई – बहिनों को अच्छे संस्कार देने से आपको हर कोई दाऊ भैया व कहता था।
त्यागीजी: अष्टमी – चौदस को एकासन, सामायिक, आलू – प्याज आदि अभक्ष्यों व रात्रिभोजन त्याग को देखकर शाला के बच्चे ‘त्यागीजी’ कहकर चिढ़ाने लगे थे।
निर्भीकता: – कटनी के शांति निकेतन संस्कृत विद्यालय में अध्ययन करते समय बच्चों ने बताया कि पीछे के वटवृक्ष में व्यंतर देव रहता है, रात को वहां मत जाना, पर रात के समय भी उस वृक्ष के नीचे निर्भीकता से आना जाना करते थे।
करुणा: बचपन में ठंड के समय गर्म कोट में नन्हें से पिल्ले को छुपा लाये और माँं की नजरों से बचाकर उसे अपने हिस्से की चाय – ब्रेड खिला दी। बाद में मां के डांटने व समझाने पर उसे पुनः उसकी मां के पास छोड़ आये।
विशेष – यदि उनके विराट व्यक्तित्व व सद्गुणों को लिखने बैठ जाए तो डायरी भी कम पड़ेगी, अतः एक ही दृष्टांत दिया है।
जाप्य: लगभग 3 करोड 75 लाख से अधिक।
व्रत : कर्मदहन, भक्तामर , णमोकार मंत्र, चरित्रशुद्धि, चौसठऋद्धि, दर्शन विशुद्धि, षट्रसी व्रत, नीतिसार, वचनगुप्ति , अष्टमी चतुर्दशी नीरस , समवशरण व्रत आदि 26 व्रत उपवास व नीरस।
तप-त्याग: दही, तेल, बैर, करोंदा, टिंडा, जामुन, सभी हरी पत्ती,मटर छोड़ सभी फली, पपीता, कटहल, लवेडे, कद्दू, तरबूज, भिंडी, खुरबानी, सीताफल, रामफल, फालसा, अंगीठा, आलूबुखारा, चौरी, शक्करपारा, कुंदरू, स्ट्रॉबेरी आदि का आजीवन त्याग।
विशेष त्याग: कूलर, पंखा, लेपटाप, मोबाइल, हीटर,नेल कटर सन् 1985 से, थूकने का त्याग 1983 से
शिविर : सम्यग्ज्ञान शिक्षिण शिविर, पूजन प्रशिक्षण शिविर, श्रावक संस्कार शिविर, प्रतिभा संस्कार शिविर
अभियान: व्यसनमुक्ति अहिंसा शाकाहार एवं रैली (प्रतिवर्ष), जिसमे अनेक प्रांतों के कई लाख छात्र- छात्राये व्यसन मुक्त हो चुके है।
पूज्य गुरुदेव के रजत आचार्य पदरोहण दिवस पर यह डाक टिकट जारी किया गया। स्थान: दिल्ली वर्ष, 2017 अवसर, रजत आचार्य पदरोहण दिवस।
पूज्य आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित होगा। भारतीय संस्कृति में श्रमण परम्परा के विकास में पूज्य आचार्य श्री का महत्वपूर्ण योगदान है। आचार्य महाराज के आशीर्वाद से विरागोदय तीर्थ पथरिया में विरागोदय महोत्सव आयोजित हुआ था। इस महामहोत्सव में देश के लाखों लोग सम्मलित होकर धर्म लाभ लेने का सौभाग्य प्राप्त किया था।
4 जुलाई 2024 की प्रातः 02ः24 बजे देवमूर्ति ग्राम जालना में प्रातः आपका समाधि मरण हुआ, समाधि स्वीकार करने से पूर्व आपने आचार्य पद एवं चारों प्रकार के आहार का त्याग कर दिया था, आपने जैन संस्कृति एवं साहित्य की अपूर्व सेवा की है, हमारा सौभाग्य की हमें आपका आशीर्वाद मिला, विरागोदय महामहोत्सव में आपकी चरण सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ, महोत्सव में आयोजित राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी में सहसंयोजक, पत्रकार सम्मेलन में संयोजक, विशेषांक संयोजक, शोध प्रतिभा सम्मान समारोह संयोजक बनने का सौभाग्य मिला था।
आपने समाधि से पूर्व आचार्य पद का त्याग कर आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज को पट्टाचार्य पद देने की घोषणा कर दी थी, आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज आगे आचार्य विरागसागर के उत्तराधिकारी होंगे। कुछ समय पूर्व ही हमें आचार्य श्री का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, सिद्धक्षेत्र नैनागिर, जिला छतरपुर म.प्र. में आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव में आपका सान्निध्य प्राप्त हुआ था, पंचकल्याणक से एक दिन पूर्व ही मेरी जन्म स्थली बम्हौरी में हमें अपने घर में आहार कराने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। आचार्य श्री विरागसागर महाराज वात्सल्य के धनी थे, आपका जीवन साहित्य सेवा के लिए समर्पित रहा है, जो कार्य अच्छे-अच्छे आचार्य नहीं कर सकें, वो कार्य आपने करके दिखाए। आपके द्वारा किये गये कार्य हमेशा जीवन्त रहे।













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