पहले जब परिवारों की संख्या कम थी तब समाज में नवजात शिशुओं का ढूंढोत्सव होता था। मगर आज के समय में जब परिवारों की संख्या कई गुना बढ़ने के बाद भी शिशुओं की वार्षिक जन्म दर न्यून रह गई है। यह देश-समाज और धर्म, सभी के लिए चिंता का विषय है। उक्त विचार अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जैन ‘शास्त्री‘ ने होलिकोत्सव सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। पढ़िए धरियावद से अशोक कुमार जेतावत की यह पूरी खबर…
धरियावद। दिगंबर जैन समाज में पहले जब परिवारों की संख्या कम थी तब समाज में वर्ष भर में 60-70 नवजात शिशुओं का ढूंढोत्सव (बहिर्यान दिवस) होता था। मगर आज के समय में जब परिवारों की संख्या कई गुना बढ़ने के बाद भी शिशुओं की वार्षिक जन्म दर 25-30 तक रह गई है। यह देश-समाज और धर्म, सभी के लिए चिंता का विषय है। उक्त विचार अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जैन ने श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर सभास्थल पर आयोजित होलिकोत्सव सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
अधिक उम्र में विवाह से अनुपात बिगड़ा
पंडित हंसमुख जैन ने अभिभावकों को अपने बच्चों का यथा-उम्र में विवाह करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि समाज में घटती जनसंख्या का प्रमुख कारण बच्चों की शैक्षणिक योग्यता और डिग्रियां हासिल करने में 28-30 साल की उम्र में विवाह होने से यह अनुपात बिगड़ गया है। पहले सास-बहू दोनों के एक वर्ष में बालक-बालिकाओं के ढूंढोत्सव एक साथ देखने को मिलते थे। अब यह अवसर दूर-दूर तक कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता है। इस पर समाज को विचार करना चाहिए। शैक्षणिक डिग्रियां बाद में भी हासिल की जा सकती है।
मुनिराज अंतरंग से होली खेलते हैं
धरियावद में श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में शुक्रवार को आयोजित ढूंढोत्सव (बहिर्यान दिवस) सभा में प्रज्ञाश्रमण मुनिश्री पुण्य सागरजी ने कहा कि मेवाड़-वागड़ में होली पर ढूंढोत्सव कार्यक्रम मनाया जाता है। आप लोग बाह्य रंगों को शरीर पर एक-दूसरे को लगाकर होली खेल सकते हैं, तो मुनिराज भी अंतरंग के रंग को आपके ऊपर डालकर होली खेल सकते हैं। आप पिचकारी से रंग खेलते हैं, तो मुनिराज अंतरंग की पिचकारी से रंग खेलते हैं।
खोटी संगत यानि न जाने यह किसके ऊपर गया
मनुष्य के परिवारों में इंसान जब जन्म लेते हैं, तो उस नवजात का चेहरा देखकर उसके परिवार के दादा, दादी, माता-पिता के चेहरों से मिलान करते हैं और कहते हैं कि यह तो मेरे जैसा है, उसके जैसा है और अगर वही बालक खोटी संगत में पड़ जाए तो कहते हैं कि न जाने यह किसके ऊपर गया है। हमारे परिवार में तो ऐसा कोई नहीं है।
मनुष्य संस्कारों का पिंड है
मनुष्य संस्कारों का पिंड है, संस्कार कोई मामूली बात नहीं है। गर्भ में माता के संस्कार, जन्म के पश्चात गुरुओं के संस्कार प्राप्त कर बालक संस्कारवान हो जाते हैं। आचार्य, मुनि-आर्यिका ससंघ साधुओं के संघ सानिध्य में वर्धमान सागरजी के सिद्ध हस्त करकमलों से नवजात बच्चों को सप्त परम स्थानों की प्राप्ति का मंगल आशीर्वाद इन नन्हे-मुन्हे बच्चों को प्राप्त हो रहा है। आप सभी में संस्कार बने रहें, यही शुभ-मंगल आशीर्वाद है। दिगंबर जैन समाज के अशोक कुमार जेतावत ने बताया कि उक्त सभा में वात्सल्य वारिधि आचार्यश्री वर्धमान सागरजी के पाद प्रक्षालन का लाभ बहादुरमल-सुनितादेवी पचौरी को प्राप्त हुआ।
व्यसन व फैशन से संस्कार बिगड़ते जा रहें
आचार्यश्री वर्धमान सागरजी ने कहा कि आज का यह मंगल दिवस छोटे-छोटे नन्हे-मुन्हे बच्चों में संस्कार रोपण का दिवस है। ढूंढोत्सव का नाम तो सुना था पर कैसा होता है, यह आज हमने देखा और सुना है। साधु संघ (52 पिच्छी) के सानिध्य में आपके नन्हे-मुन्हे बच्चों को संस्कार मिल रहे हैं। यह सौभाग्य की बात है। आज व्यसन और फैशन के युग में संस्कार बिगड़ते जा रहे हैं। फिल्मी दुनिया के संस्कार लोगों पर हावी हैं। आज परिवारों में विकृतियां आने लगी हैं। बहुओं के सास-ससुर के अनुशासन में रहने की कमी हो गई है। एकल परिवारों की संस्कृति बढ़ गई है।
लालन-पोषण व संस्कारों का बीजारोपण जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि बच्चों का लालन-पोषण के साथ उनमें संस्कारों का बीजारोपण करना भी जरूरी है। वर्धमान सागर जी महाराज की शिष्या एवं संघस्थ आर्यिका महायशमति माताजी का उदाहरण देते हुए कहा कि गृहस्थ अवस्था में लौकिक शिक्षा में एमएससी तक की पढ़ाई करने के बाद जब संयम मार्ग पर बढ़ने की बात आई तो परिवार वाले एक तरफ खड़े होकर विरोध करने लगे। तब उन्होंने अपनी डायरी खोलकर बताई जिसमें उनके दादाजी समाधिस्थ मुनिश्री चारित्र सागरजी द्वारा लिखित उपदेश आशीर्वाद के रूप में बताया कि आर्यिका दीक्षा लेकर समाधिमरण जब बताया तो सब चुप रह गए। आचार्यश्री ने कहा कि तपश्चरण थोड़ा करें लेकिन संयम नियम पूर्वक करें।













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