तरुणसागरम तीर्थ, कोडरमा में दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन परम पूज्य आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महामुनिराज ने उपस्थित गुरु-भक्तों को उत्तम तप धर्म का संदेश दिया। उन्होंने इच्छाओं को रोकने, मन की उछलकूद को नियंत्रित करने और संयमपूर्वक जीवन जीने का महत्व समझाया।
तरुणसागरम तीर्थ, कोडरमा में वर्षायोग हेतु विराजमान आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महामुनिराज एवं उपाध्याय श्री 108 पियूष सागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में दशलक्षण महापर्व का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए। आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि पर्वों के पर्वराज का सातवाँ चरण – उत्तम तप है। जीवन में कुछ करने का हौसला होना चाहिए। उन्होंने कहा: “हमने अभी चलना शुरू किया है, उड़ना अभी बाकी है। अभी नापी है मुट्ठी भर जमीन, आसमान नापना बाकी है।”
उत्तम तप का अर्थ है – मन की उछलकूद को रोकना और इच्छाओं का नियंत्रण करना। आचार्य श्री ने समझाया कि मन में बनी इच्छाएँ अनंत हैं, जबकि बाहरी संसार छोटा है। उन्होंने कहा कि आवश्यकता से अधिक इच्छा दुखदायी होती है और व्यक्ति को तनाव व रोगों में डालती है।
भूख से कम भोजन करना भी तप का हिस्सा
आचार्य श्री ने दो प्रमुख इन्द्रियों – चक्षु और रसना – के नियंत्रण को तप का मुख्य अंग बताया। भूख से कम भोजन करना भी तप का हिस्सा है। उन्होंने साधु-सन्यासियों और ज्ञानी जीवों के कम भोजन और लंबी आयु के उदाहरण से यह सिद्ध किया कि संयम और तप से स्वास्थ्य और बुद्धि बेहतर रहती है। उन्होंने कहा कि तप-त्याग की भट्टी में तपने वाले लोग ही संसार के बाजार में सफल होते हैं। इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे।













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