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तीर्थराज सम्मेद शिखरजी की पवित्रता पर मंडराता खतरा: 14 और 15 जनवरी को बड़ी संख्या में अजैन लोग पहुंचेंगे सम्मेद शिखरजी पर्वत 


धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले तीर्थराज सम्मेदशिखर जी पर हर साल 14 और 15 जनवरी को बड़ी संख्या में लोगों का आना होता है। ऐसे में पर्वत पर गंदगी से अपवित्रता होती है। इसको रोके जाने की जरूरत है। इस मसले पर चिंतन के साथ योग्य कदम उठाए जाने की आवश्यकता पर बल देने की जरूरत है। कोटा से पढ़िए से स्पेशल रिपोर्ट…


कोटा। प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण धरती का स्वर्ग एक बार बंदे, जो कोई ताकि नरक पशुपति नहीं होई, ऐसे महान तीर्थ राज सम्मेद शिखर की बात है। तीर्थ स्थलों का कण-कण पूजनीय, वंदनीय और अभिनंदनीय होता है। तीर्थ स्थलों की पावन भूमि अनंतानंत जीवों के तप, त्याग और साधना की रज से पवित्र होती है। जिस जगह से करोड़ों जीवों ने संसार शरीर और भोगों को त्यागकर तप, त्याग और साधना के मार्ग को अपनाकर संसार बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त किया। ऐसे पवित्र पावन स्थल को अपवित्र करना कितने घोर पाप के बंध का कार्य हो रहा है। हर साल 14 और 15 जनवरी को लाखों की संख्या में लोग तीर्थराज पर्वत पर पर्यटन के लिए घूमने आते है। इन दो दिनों के लिए पूरे भारत से जो यात्री श्रद्धालुगण शिखर जी आते हैं, उनको पर्वत पर वंदना के लिए नहीं जाने दिया जाता है। ये लोग पूरे पर्वत पर अपवित्रता फैलाते हैं।

प्रकृति के आयामों से खिलवाड़ विकृति का कारण

संपूर्ण भारत वर्ष का जैन समाज मूकदर्शक बनकर रह जाता है। ये कैसी विडंबना है? तीर्थ स्थलों पर जन्मों-जन्म के पापो का नाश और पुण्य का संचय होता है। ऐसे तीर्थ स्थल पतित से पावन कंकर से शंकर नर से नारायण बनने के लिए होते हैं। आज के कलयुग में हमें कैसे-कैसे नजारे देखने को मिल रहे हैं। ये सब कई सालांे से चल रहा है। ये प्रकृति में विकृति का बहुत बड़ा कारण बनता है। जब-जब मानव ने प्रकृति के आयामों के साथ खिलवाड़ किया है, तब-तब प्रकृति में विकृति आई हैं। हमें प्रकृति में संस्कृति का शंखनाद करना चाहिए। प्रकृति में विकृति का सबसे बड़ा रूप कोरोना सबको सबक सिखा गया। सादगी से जीवन जीने की कला भी सिखा गया। पूजनीय, वंदनीय और अभिनंदनीय पवित्र स्थल को अपवित्र करना संपूर्ण भारत वर्ष के जैन समाज के लिए बेहद दुःखद, शर्मनाक और कलंकित घटना है।

धर्म स्थलों पर कब्जा गंभीर चिंतन का विषय

जैन समाज के जितने भी तीर्थ क्षेत्र अतिशय क्षेत्र सिद्ध क्षेत्र हैं। उनकी पवित्रता, पावनता और शुद्धता बनी रहनी चाहिए। इसके लिए सबसे पहले उन सभी क्षेत्र में बाउंड्रीवाल करवा देना चाहिए। हम नए-नए मंदिर बनाते जा रहे हैं और दूसरे हमारे प्राचीन तीर्थों और मंदिरों पर कब्जा करते जा रहे हैं। मुझे यह बात समझ नहीं आती कि संपूर्ण भारत में आज तक जैन समाज द्वारा किसी भी अन्य धर्म या संप्रदाय के स्थान पर नाजायज कब्जा कर अपना धर्म स्थल घोषित नहीं किया तो फिर दूसरे धर्म के लोग क्यों हमारे तीर्थों धार्मिक स्थलों पर नाजायज कब्जा करने में क्यों लगे हुए हैं? ये बड़ा सोचनीय गंभीर विषय है।

जैन तीर्थ क्षेत्र की रक्षा सुरक्षा करना हमारा कर्तव्य

सबसे बड़ा उदाहरण गुजरात प्रांत में सिद्ध क्षेत्र गिरनार जी को ले लीजिए। वह भी हमारे हाथ से निकलता का रहा हैं। वहां दत्तात्रय मंदिर के सौंदर्यकरण के लिए सरकार ने करोड़ों की राशि का बजट पास कर दिया। इंदौर गोमटगिरी तीर्थ क्षेत्र में दूसरे समाज के लोगों के लिए जगह देनी पड़ी। दिल्ली का कुतुबमीनार न जाने कितने जैन मंदिरों को तोड़कर बनाया गया। जैन तीर्थ क्षेत्र की रक्षा सुरक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।

जैन तीर्थ घोषित किए जाएं

अब समय की मांग है कि संपूर्ण भारत में जितने भी चातुर्मास जिस नगर में जहां पर हो वहां पर एक तीर्थ रक्षा कलश की भी स्थापना करनी चाहिए। चातुर्मास के बाद उस राशि को उस अतिशय तीर्थ क्षेत्र के बाउंड्रीवाल करवाने में लगा देनी चाहिए। ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए। तीर्थों को पर्यटन स्थल नहीं अपितु जैन तीर्थ घोषित करना चाहिए। इनकी प्राचीनता, पावनता, पवित्रता, भव्यता, पुरातत्वता प्रमाणिकता ज्यों की त्यों बनी रहे। प्राचीन तीर्थ भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर हैं। इसकी रक्षा होनी चाहिए।

पवित्रता बनाए रखने की अपील

जैन समाज की बड़ी बड़ी संस्थाओं के प्रतिनिधि मंडल से आत्मीय निवेदन करता हूं कि इस विषय को गंभीरता से लें और तीर्थ स्थलों की पवित्रता बनाए रखें।

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