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बच्चे सीख रहे हैं अभिषेक पूजन पद्धति : विनम्र एकेडमी में चल रहे हैं विशेष कार्यक्रम 


विनम्र एकेडमी पाठशाला में शांतिनाथ दिगम्बर जैन बड़े मंदिर में रविवार को जैन समाज के बच्चों ने पहुंचकर भगवान महावीर की विशेष पूजा-अर्चना की। बच्चों के लिए इस विशेष कार्यक्रम किया गया है। जिसमें 8 वर्ष से लेकर 16 वर्ष तक आयु वर्ग के बच्चे-बच्चियां सम्मलित हुए हैं। भगवान की प्रतिमा का पूजन करने की विधि बच्चों को बताई गई। अंबाह से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


अंबाह। विनम्र एकेडमी पाठशाला में शांतिनाथ दिगम्बर जैन बड़े मंदिर में रविवार को जैन समाज के बच्चों ने पहुंचकर भगवान महावीर की विशेष पूजा-अर्चना की। समाज के वरिष्ठ जनों ने बताया कि इस समय बच्चों की छुट्टियां चल रही हैं। बच्चों में जैन धर्म के संस्कार व धर्म प्रभावना प्रवाहित हो सके, इसके लिए इस विशेष कार्यक्रम किया गया है। जिसमें 8 वर्ष से लेकर 16 वर्ष तक आयु वर्ग के बच्चे-बच्चियां सम्मलित हुए हैं। इस दौरान भगवान की प्रतिमा का पूजन करने की विधि बच्चों को बताई गई। समाज के वरिष्ठ पुजारी व बालिका मंडल प्रमुख राजुल जैन और उनके साथी सदस्यों ने जिनेंद्र भगवान का विधि विधान पूर्वक पूजा-अर्चना करना छोटे-छोटे बच्चों को सिखाया।

इसके साथ ही पूजन में आवश्यक नियमों का पालन किस तरह करें, इस संबंध में भी बच्चों को जानकारी दी गई। राजुल जैन ने बताया कि भगवान की पूजन की विधि सीखने प्रति रविवार बच्चे उत्साह के साथ आ रहे हैं। बच्चों को बताया गया कि वह जैन मंदिर में प्रवेश करते ही णमोकार मंत्र बोलें। मंत्र बोलकर हम वादा करते हैं कि मंदिर के भीतर हम सांसारिक विचार, बातें या प्रवृत्ति नहीं करेंगे।

बच्चों के साथ बड़े भी सही विधि से पूजन विधि सीख सकते हैं

सबसे पहले केसर-चंदन रखने के कमरे में जाकर हम अपनी ललाट पर दो भौंहों के बीच बराबर आज्ञा चक्र के बिन्दु पर बादाम के आकार का, दीये की लौ-ज्योति जैसा तिलक करें। वही बिना सही विधि के पूजा करने से भगवान की असातना भी होती हैं। राजुल जैन ने बताया कि इस शिविर में समाज के बच्चों के साथ बड़े भी सही विधि से पूजन करना सीख सकते हैं। उन्होंने कहा कि जो बच्चे नियमित पूजा करने आते है, उन सभी बच्चों को पुरस्कृत भी किया जाता है। उक्त संबंध में आयोजकों ने बताया कि उनका उद्देश्य भविष्य के लिए पुजारी तैयार करना है जिससे मंदिरों में पूजा अर्चना होती रहे और सभी में धार्मिक संस्कार बने रहे।

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