इंदौर शहर के 19 जैन मंदिरों में 19 संघों के लगभग 102 दिगंबर जैन संतों का चातुर्मास चल रहा है। सभी संत 9 से 13 जुलाई के बीच अपने-अपने स्थानों पर चातुर्मास कलश की स्थापना करेंगे।इसकी स्थापना आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से श्रावण कृष्ण पंचमी के बीच की जाती है और कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को इसका निष्ठापन होता है। इंदौर में हो रहे इन संतों के चातुर्मास की जानकारी और उनके चित्र ‘श्रीफल जैन न्यूज’ की संपादक रेखा संजय जैन द्वारा एकत्रित की गई है। आइए, आप भी इसे पढ़ें….
इंदौर। इंदौर शहर के 19 मंदिरों में 19 संघों के 102 दिगंबर जैन समाज के संतों का चातुर्मास चल रहा है। जो विभिन्न स्थानों पर चातुर्मास कर रहे हैं। इंदौर में 9 जुलाई से 13 जुलाई के बीच सभी संतगण अपने-अपने चातुर्मास कलश की स्थापना कर लेंगे। चातुर्मास की अवधि परिस्थिति अनुसार 100, 120 या 165 दिनों की होती है। चातुर्मास की स्थापना आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से श्रावण कृष्ण पंचमी के बीच की जाती है, और इसका निष्ठापन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को होता है।



















चातुर्मास की अवधि: 100, 120 या 165 दिन क्यों?
चातुर्मास तप, संयम, व्रत, ध्यान और साधना के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है। परंपरानुसार साधु-संत इस दौरान एक ही स्थान पर रहकर आत्मचिंतन और प्रवचन करते हैं। सामान्य रूप से यह अवधि चार महीनों की होती है, लेकिन प्रचलन में इसके 100, 120 या 165 दिनों तक चलने की बात कही जाती है। यह भिन्नता क्यों है?
1. 100 दिनों की अवधि(श्रावण कृष्ण चतुर्थी से कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तक )
कुछ परंपराओं और मठों में केवल तीन मासों (श्रावण, भाद्रपद, आश्विन) को ही चातुर्मास की मुख्य साधना अवधि माना जाता है। ऐसे में यह अवधि लगभग 100 दिन की होती है। यह विशेष रूप से जैन मुनियों में देखने को मिलता है, जहां संक्षिप्त अवधि के चातुर्मास को स्वीकार किया जाता है।
2. 120 दिनों की सामान्य अवधि(आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी से कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा)
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में वर्णित परंपरागत चातुर्मास की अवधि चार मासों की होती है – आषाढ़ से कार्तिक तक। यह अवधि सबसे अधिक प्रचलित और मान्य मानी जाती है और अधिकांश धर्मावलंबी इसी के अनुसार व्रत, उपवास, पूजा और नियमों का पालन करते हैं।
3. 165 दिनों की विशेष अवधि (आषाढ़ शुक्ल दशमी से मगसिर शुक्ल पूर्णिमा)
कई बार वर्षयोग ग्रहण करने से महीने पहले और एक महीने अनंतर रहने का भी विधान होता है। इसलिए साढ़े पांच महीने या 165 दिन का विशेष चातुर्मास होता है। इसके अलावा हर 2.5 से 3 वर्षों में एक अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) आता है, जिसे धार्मिक पंचांग में एक अतिरिक्त माह के रूप में जोड़ा जाता है ताकि चंद्र कैलेंडर और सौर कैलेंडर का संतुलन बना रहे। यदि यह अधिक मास चातुर्मास के भीतर पड़ता है, तो चातुर्मास की अवधि स्वतः बढ़कर लगभग 165 दिन तक पहुंच जाती है। यह परिस्थिति दुर्लभ होती है, लेकिन जब आती है तो साधु-संत और व्रती उसी अनुसार अपने नियमों को विस्तारित करते हैं।













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