दान देकर के ही साधु और श्रावक दोनों ही कृतार्थ होते हैं। दान कोई सामाजिक व्यवस्था का वित्त प्रबंधन नहीं है अपितु यह वित्त प्रबंधन का एक उत्कृष्ट माध्यम है। केकड़ी, राजस्थान में श्रुतसंवेगी मुनि श्री आदित्यसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में आयोजित श्रावकाचार अनुशीलन राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी में उक्त विचार नगर के मनीषी विद्वान डॉ. सुनील जैन संचय ने ‘दान का सार्थक स्वरूप और पनपती विकृतियां’ विषय पर अपना शोधालेख प्रस्तुत करते हुए कहीं। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
ललितपुर। ‘दान’ को जैनधर्म में श्रावक का प्रतिदिन करणीय आवश्यक कर्तव्य माना जाता है। हमें आज के युग में उसकी आवश्यकता पर भी विचार करना है। प्रायः दान को लेकर लोगों में सामान्य ज्ञान ही रहता है और कई प्रकरणों में अज्ञानता के कारण उनका दान पुण्य के स्थान पर पाप बंध का कारण भी बन जाता है। दान के महत्व को संक्षेप में कथन करना है तो उल्लेख है कि दान धर्म ऐसा तीर्थ है जिससे भव सागर को आसानी से पार किया जा सकता है। हमारे शास्त्रों में उल्लेख है कि ‘दानं दुर्गति नाशनम्’ दान से दुर्गति का नाश होता है। दान देकर के ही साधु और श्रावक दोनों ही कृतार्थ होते हैं। दान कोई सामाजिक व्यवस्था का वित्त प्रबंधन नहीं है अपितु यह वित्त प्रबंधन का एक उत्कृष्ट माध्यम है। केकड़ी, राजस्थान में श्रुतसंवेगी मुनि श्री आदित्यसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में आयोजित श्रावकाचार अनुशीलन राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी में उक्त विचार नगर के मनीषी विद्वान डॉ. सुनील जैन संचय ने ‘दान का सार्थक स्वरूप और पनपती विकृतियां’ विषय पर अपना शोधालेख प्रस्तुत करते हुए कहीं।
दान देने वाला कहलाता है दाता
उन्होंने कहा कि दान के संदर्भ में दाता, दान और पात्र की स्थिति समझना बहुत जरूरी है। दान देने वाला दाता कहलाता है, वह दाता विनम्रता पूर्वक, धर्म भावों से सत्पात्रों की खोजकर अपने द्रव्य का सदुपयोग करता है। दान का लक्षण लिखते हुए आचार्य उमास्वामी महाराज कहते हैं ‘अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गों दानम्। उपकार की भावना से अपनी वस्तु का त्याग करना दान है। पहली बात उपकार बुद्धि हो और दूसरी बात अपनी वस्तु हो। बुद्धि में मान बढ़ाई का भाव नहीं, स्वार्थपूर्ति या सौदेबाजी जैसी बात न हो। आहारदान, औषधदान, ज्ञानदान, अभयदान इन चार प्रकार के दानों का वर्णन किया गया है। जैन शास्त्र किसी भी रूप में यह आज्ञा नहीं देते कि अन्याय एवं पाप से धन अर्जित करो और उसका दान करते रहो एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करो। आचार्य पूज्यपाद स्वामी इष्टोपदेश में लिखते हैं- “जो मनुष्य दान करने की आशा से धन संचय करते हैं, वे उस मनुष्य की तरह है जो “स्नान कर लूंगा” इस आशा से पहले कीचड़ लपेटता है। संचय से त्याग श्रेष्ठ है। अतः गृहस्थ धर्म को निर्वहन करते हुए न्यायपूर्वक उपार्जित धन में से कुछ त्यागपूर्वक स्व-पर उपकार के भाव से दान देना चाहिए। इससे गृहस्थ धर्म पवित्र होता है। संसार के उत्तमोत्तम सुख, माता-पिता, पुत्र, स्त्री, धन-धान्य, मकान, वाहन तथा संसार के समस्त वैभव-सम्पत्ति, आभूषण आदि ये सब सुपात्र में दिये गए दान के फल हैं। उन्होंने कहा कि दान हमेशा हर्षित भाव से देना चाहिए, मान बड़ाई, अहंकार, प्रतिष्ठा, दिखावे के लिए दान नहीं दिया जाना चाहिए। दान को हमें व्यापक अर्थों में समझने की आवश्यकता है, उसे मात्र क्रियाकांड न समझकर उसकी आध्यात्मिकता को सुरक्षित रखा जाय, तभी उसकी सार्थकता है। सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. श्रेयांस कुमार जैन बड़ौत ने दान की महत्वत्ता को प्रतिपादित किया। संचालन राजेन्द्र ‘महावीर’ सनावद ने किया।
डॉ. सुनील संचय हुए सम्मानित
इस मौके पर मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने डॉ सुनील संचय के आलेख की प्रसंशा करते हुए कहा कि शोधालेख कैसे प्रस्तुत किए जाते हैं, यह सीखना हो तो डॉ सुनील संचय के शोधालेख से सीख सकते हैं, इसके लिए उन्हें अवार्ड मिलना चाहिए। आयोजन समिति ने डॉ. सुनील संचय को शाल, पगड़ी, स्मृति चिन्ह, श्रीफल, साहित्य भेंटकर सम्मानित किया।
ये भी रहे मौजूद
इस मौके पर डॉ. शीतलचंद्र जयपुर, डॉ श्रेयांस कुमार बड़ौत, प्रोफेसर श्रीयांस सिंघई जयपुर, डॉ . अनिल भैया प्राचार्य जयपुर, पंडित विनोद कुमार रजवांस, प्रो. अनेकान्त जैन दिल्ली , डॉ धर्मेंद्र भैया जयपुर,डॉ. पंकज कुमार इंदौर, डॉ आशीष आचार्य सागर, डॉ. सोनल कुमार दिल्ली आदि विद्वान प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। आयोजन समिति के अध्यक्ष भवरलाल केकड़ी ने आभार व्यक्त किया।













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