आचार्य विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी, मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्रुतसागरजी भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। यहां आचार्य विराग सागरजी प्रथम समाधि दिवस पर विनयांजलि सभा हुई। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…
नांद्रे। आचार्य विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागर महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर नांद्रे में विराजमान हैं। यहां आचार्य विराग सागरजी प्रथम समाधि दिवस पर विनयांजलि सभा हुई। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के शिष्य मुनि श्री सिद्ध सागरजी ने नांद्रे में आचार्य श्री विराग सागर महाराज जी के प्रथम स्मृति दिन पर अपने प्रवचन में कहा कि आचार्य श्री आदिसागर जी ‘अंकलीकर’, उनके शिष्य आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी महाराज, उनके शिष्य आचार्य श्री विमलसागर जी, उनके शिष्य आचार्य श्री सन्मतिसागर जी, तथा आचार्य श्री विरागसागर जी महाराज की परंपरा में आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज अत्यंत प्रेरणास्पद हैं।
आचार्य श्री विरागसागर जी का जन्म 2 मई 1963 को दमोह जिले के पथरिया में हुआ था। इनके पिता का नाम कपूरचंद और माता का नाम श्यामादेवी था। बचपन में उनका नाम अरविंद था। 2 जून 1980 को मध्यप्रदेश कि धार्मिक नगरी बुढार में आचार्य श्री सन्मतिसागर जी महाराज (फफोतू ) के करकमलों से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण कर क्षुल्लक श्री पूर्णसागर जी बन गए। औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में 1 दिसंबर 1983 को आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की। आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज एवं आचार्य श्री सन्मतिसागर जी महाराज की अनुमति से 8 नवंबर 1992 को सिद्धक्षेत्र द्रोणागिरी (मप्र) में चतुर्विध संघ द्वारा आपको आचार्य पद प्रदान किया गया। आचार्य विरागसागर महाराज जी ने 227 शिष्यों को दीक्षा दी हैं। जो संपूर्ण भारतवर्ष में धर्म की भारी प्रभावना कर रहे हैं।













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