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आचार्य श्री धर्मसागर जी का 113 वां अवतरण दिवस मनाया : आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने दीक्षा गुरु को स्मरण कर उनका गुणानुवाद किया 


प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की अक्षुण्ण मूल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर संघ सानिध्य में आचार्य श्री धर्मसागर जी का 113 वां अवतरण दिवस गुरु भक्तों ने मनाया। इस अवसर पर आचार्य श्री धर्मसागर विधान का पूजन किया गया। निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया इंदौर की यह खबर…


निवाई। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की अक्षुण्ण मूल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर संघ सानिध्य में आचार्य श्री धर्मसागर जी का 113 वां अवतरण दिवस गुरु भक्तों ने मनाया। इस अवसर पर आचार्य श्री धर्मसागर विधान का पूजन किया गया। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने दीक्षा गुरु को स्मरण कर उनका गुणानुवाद कर बताया कि आज ऐसे भव्य पुण्यात्मा को स्मरण करने का दिन है। जिनके जन्म दिवस और समाधि दिवस पर तीर्थंकर भगवान का कल्याणक दिवस था और जो श्रमण परंपरा के गौरव प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की मूल परंपरा में तृतीय पट्टाधीश बने। गंभीरा में सन 1914 में श्री धर्मनाथ भगवान के केवल ज्ञान कल्याणक दिवस पर जन्मे चिरंजीलाल जी का प्राथमिक जीवन संघर्ष तथा निर्माेहता के साथ बीता। मात्र 15 वर्ष की उम्र में शुद्ध जल के नियम 30 वर्ष की उम्र में क्षुल्लक तथा 38 वर्ष की उम्र में मुनि दीक्षा ली।

साधु जीवन के 43 वर्षाें में 76 दीक्षा दीं

संयोग देखिए कि श्री धर्मनाथ भगवान के कल्याणक पर जन्मे आपकी मुनि दीक्षा बाद नाम भी भगवान के नाम पर ही मुनि श्री धर्मसागर जी किया गया। सन 1969 में आप द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिवसागर जी की समाधि के बाद तृतीय पट्टाधीश बनाए गए। साधु जीवन के 43 वर्षाें में आपने 76 दीक्षा दीं। जिसमे आचार्य पदारोहण पर 11 भव्य प्राणियों को दीक्षा दी। जिसमें हमें भी मुनि दीक्षा देकर हम पर उपकार किया। यह मंगल देशना आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने श्री धर्म सागर विधान के पूजन पर प्रगट की।

113 वां वर्ष वर्धन अवतरण दिवस 

पवन बोहरा के अनुसार वर्तमान में आचार्य श्री वर्धमान सागर, आर्यिका श्री शुभमति माताजी सहित 6 शिष्य एवं शिष्या धर्म प्रभावना कर रहे हैं। आज आपका 113 वां वर्ष वर्धन अवतरण दिवस है। सन 1987 में आपकी समाधि श्री मुनिसुव्रत नाथ भगवान के केवल ज्ञान कल्याणक के दिन सीकर में हुई थी।

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