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जैन संत आचार्य श्रेष्ठ विद्यासागर महाराज का महाप्रयाण : ललितपुर में व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे


आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के समाधिस्थ होने की खबर ज्यों ही ललितपुरवासियों को हुई, शोक की लहर छा गई। निजी साधनों से डोगरगढ़ में विराजित आचार्य श्री के अन्तिम दर्शन के लिए रवाना हुए और अन्तिम यात्रा में सम्मलित होकर पुण्यार्जन किया। प्रातःकाल से ही ललितपुर नगर में व्यापारियों ने अपने प्रतिष्ठान स्वतः ही बंद रखकर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। पढ़िए राजीव सिघाई की रिपोर्ट….


ललितपुर। जेैन जगत के प्रख्यात संत आचार्य श्रेष्ठ विद्यासागर महामुनिराज की संल्लेखनापूर्वक समािध छत्तीसगढ के डोंगरगढ स्थित चन्द्रगिरि तीर्थ पर हुई। आचार्य श्री अन्तिम समय तक चैतन्य अवस्था में रहे। उन्होंने आचार्य पद का त्याग करते हुए तीन दिन के उपवास ग्रहण किया और संघ का प्रत्याख्यान कर दिया था। अखण्ड मौन साधना धारण कर ध्यान में लीन हुए आचार्य श्री 17 फरवरी शनिवार को रात्रि 2-35 बजे अन्तिम सांस ली । खबर मिलते ही जैन समाज में शोक की लहर फैली और त्याग और संयम का मार्ग प्रशस्त करने वाले अध्यात्म जगत के सूर्य का अंत हो गया। आचार्य श्री के अन्तिम दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ डोंगरगढ़ में उमड़ी। आचार्य श्री के समाधिस्थ होने की खबर ज्यों ही ललितपुरवासियों को हुई, शोक की लहर छा गई। निजी साधनों से डोगरगढ़ में विराजित आचार्य श्री के अन्तिम दर्शन के लिए रवाना हुए और अन्तिम यात्रा में सम्मलित होकर पुण्यार्जन किया। प्रातःकाल से ही ललितपुर नगर में व्यापारियों ने अपने प्रतिष्ठान स्वतः ही बंद रखकर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं।

बुंदेलखंड में रहे काफी समय 

आचार्य श्री का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को कर्नाटक प्रान्त के बेलगांव जिले के सदलगा गांव में हुआ था। उन्होंने 30 जून 1968 को राजस्थान के अजमेर नगर में अपने गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज से मुनि दीक्षा लेकर कठोर तपस्या की, जिसको देखकर उन्होंने अपना आचार्य पद सौंपा। आचार्य श्री 1975 में बुन्देलखंड आए, जहां वह जैन समाज में भक्ति और समर्पण से वह इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना अधिकांश समय बुन्देलखंड में व्यतीत किया। आचार्य श्री ने लगभग 350 से अधिक दीक्षाएं दीं। उनके शिष्य पूरे देश में विहार कर जैनधर्म की प्रभावना कर रहे हैं। आचार्य श्री संस्कृत, प्राकृत सहित विभिन्न भाषाओं, हिन्दी, मराठी और कन्नड़ में विशेषज्ञ स्तर का ज्ञान रखते हैं। सौ से अधिक उनके कार्य का मास्टर्स और डाक्टेट के लिए अध्ययन किया है। आचार्य श्री की प्रेरणा से हजारों गाय का संरक्षण गौशाला के माध्यम से हो रहा है, वहीं हजारों बालिकाएं प्रतिभास्थली में संस्कारित हो रही है। यही नहीं हथकरघा, भाग्योदय और पूर्णायु से आम-जन जुड़कर लाभान्वित हो रहे हैं। आचार्य श्री ने अपनी अभूतपूर्व तपश्चर्या के चलते पूरे विश्व में साधना का एक कीर्तिमान बना, जिस कारण उन्हें पिछले सप्ताह ही गिनीज बुक ऑफ द वर्ल्ड रिकार्ड संस्था द्वारा व्रहमांण्ड के देवता की उपाधि प्रदान की गई थी।

ललितपुरवासियों को खूब मिला आचार्य श्री का आशीर्वाद

संत शिरोमणि आचार्य श्रेष्ठ विद्यासागर महाराज का सानिध्य एवं आशीर्वाद ललितपुरवासियों को भरपूर मिला। सन् 1988 में ससंघ लगातार तीन वाचनाओं में अपूर्व अध्यात्म की प्रभावना हुई। आचार्य श्री के आशीर्वाद से 1998 में दयोदय पशुसंरक्षण केन्द्र गौशाला एवं 2018 में आचार्य श्री के सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव जैनेश्वरी दीक्षाओं का भव्य आयोजन हुआ। बालिकाओं के लिए आवासीय शिक्षा हेतु 2021 में प्रतिभास्थली आचार्य श्री के आशीर्वाद से शुरू हुई।

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