राजस्थान के जैन संतों की परंपरा में ब्रह्म धर्मसागर जी का स्थान भी काफी महत्वपूर्ण है। इन्होंने अधिकांश गीत अपने गुरु की प्रशंसा में ही लिखे हैं। इनके गीतों में सौंदर्य का भी पुट है तो विरह की वेदना भी नजर आती है। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 42वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का ब्रह्म धर्मसागर के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
राजस्थान के जैन संतों की परंपरा में ब्रह्म धर्मसागर जी का स्थान भी काफी महत्वपूर्ण है। इन्होंने अधिकांश गीत अपने गुरु की प्रशंसा में ही लिखे हैं। इनके गीतों में सौंदर्य का भी पुट है तो विरह की वेदना भी नजर आती है। ब्रह्म धर्मसागर जी भट्टारक अभयचंद्र (द्वितीय) के शिष्य थे तथा कवि के साथ-साथ संगीतज्ञ भी थे। अपने गुरु के साथ रहते और विहार के अवसर पर उनका विभिन्न गीतों के माध्यम से प्रशंसा और स्तवन किया करते थे। अब तक इनके 11 से अधिक गीत उपलब्ध हो चुके हैं। जो मुख्यतः नेमिनाथ एवं भट्टारक अभयचंद्र जी के स्वतन में लिखे गए हैं। नेमि और राजुल के गीतों में राजुल के विरह एव सुंदरता का अच्छा वर्णन किया है।
दुखड़ा लोउ रे ताहरा, नामनां, बलि-बलि लागु छुं पायनरे।
बोलड़ो घोरे मुझने नेमजी, निठुर न थइये यादव रायनरे।
किम रे तोरण तम्हें आविया, करि अमस्युं घणो नेहन रे।
पशुअ देखी ने पाछा बल्या, स्युं दे विमास्युं मन रोहन रे।
इम नहीं कीजे रुडा न होला, तम्हें अति चतुर सुजांणन रे।
लोकह सार तन कीजीए, छेह न दीजिये निवाणिन रे।
(….नेमि गीत )
इन कवि की अब तक 11 कृतियां उपलब्ध हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। मरकलडा गीत, नेमिगीत, नेमिश्वर गीत, लाल पछेवडी गीत तथा गुरु गीत आदि हैं।













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