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पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ का जन्म, ज्ञान मोक्ष कल्याणक: तिथि के अनुसार चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन आती हैं भगवान के तीनों कल्याणक, इस बार यह 8 अप्रैल को 


जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी का जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक 8 अप्रैल को पारंपरिक धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ समूचे देश में मनाया जाएगा। भगवान सुमतिनाथ के जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ल एकादशी को आते हैं। इस बार यह तिथि 8 अप्रैल को है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह विशेष प्रस्तुति पढ़िए…


इंदौर। जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ जी का जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक 8 अप्रैल को पारंपरिक धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ समूचे देश में मनाया जाएगा। भगवान सुमतिनाथ के जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ल एकादशी को आते हैं। इस बार यह तिथि 8 अप्रैल को आ रही है। शहर सहित देश के विभिन्न शहरों,नगरों और कस्बों में भगवान सुमतिनाथ के तीनों कल्याणक के अवसर पर दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों में पूरी श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ अभिषेक, शांतिधारा और निर्वाण कांड पाठ सहित निर्वाण लाडू चढ़ाने आदि के विधान पारंपरिक रूप से किए जाएंगे।

मानव जाति के कल्याण के लिए दिए संदेश 

भगवान सुमतिनाथ जी ने अपने जीवन काल में जैन धर्मावलंबियों और समस्त मानव जाति को सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने का संदेश दिया। भगवान ने इस मूल मंत्र को स्वयं तो जीवन में उतारा ही साथ ही मानव समाज के लिए उन्होंने अपनी देशनाओं में इस पर अधिक से अधिक जोर दिया। धर्म मार्ग पर चलकर मोक्ष तक का जीवन का सफर उनकी देशनाओं का मुख्य आधार रहा है। अपने धर्म पर अडिग रहने और सत्याचरण कर जीवों पर दया करने और हिंसा का त्याग करने का संदेश जगत में प्रसारित किया। इससे समूल मानव जाति का कल्याण हुआ।

जन्म, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक एक ही तिथि को 

जैन धर्म के ग्रंथों के अनुसार भगवान सुमतिनाथ जी जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर थे। भगवान सुमतिनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश के राजा मेघप्रय की पत्नी रानी सुमंगला के गर्भ से चैत्र शुक्ल एकादशी को पावन नगरी अयोध्या में हुआ था। इनके शरीर का वर्ण सुवर्ण था, जबकि इनका चिह्न चकवा था। भगवान सुमतिनाथ जी के यक्ष का नाम तुम्बुरव तथा यक्षिणी का नाम वज्रांकुशा था। जैनियों के मतानुसार सुमतिनाथ के गणधरों की संख्या 100 थी। चरम स्वामी इनके गणधरों में प्रथम गणधर थे। भगवान सुमतिनाथ को वैशाख शुक्ल नवमी को अयोध्या में दीक्षा प्राप्ति हुई थी। दीक्षा मिलने के बाद भगवान सुमतिनाथ जी ने 2 दिन बाद खीर से प्रथम पारणा किया था। 20 वर्ष तक कठोर तप के बाद अयोध्या में ही चैत्र शुक्ल एकादशी को ‘प्रियंगु’ वृक्ष के नीचे इन्हें ‘कैवल्य ज्ञान’ की प्राप्ति हुई। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार सुमतिनाथ ने कई वर्षों तक मानव जाति को अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। जैन धर्म की कथानुसार भगवान श्री सुमतिनाथ का चैत्र शुक्ल एकादशी को ही सम्मेद शिखर पर निर्वाण हुआ और वे मोक्ष को प्राप्त हुए।

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