जैन धर्म को तीर्थंकर भगवानों ने आगे बढ़ाने में महती भूमिका निभाकर धर्म प्रभावना के माध्यम से जन-जन तक आघ्यात्मिक संदेश प्रसारित और प्रसारित किए हैं। जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर श्री वासु पूज्य भगवान ने भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ाते हुए जैन समाज को धर्म के साथ-साथ आध्यात्मिक शक्ति के माध्यम से अपने भव को बदलने के लिए भक्ति, आराधना और नियमादि के लिए प्रेरित किया। इसीलिए भगवान श्री वासुपूज्यजी का पूजन-विधान श्रेष्ठतम माना गया है। 27 फरवरी को भगवान का जन्म और तप कल्याणक मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार यह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन आ रहा है। दिगंबर जैन जिनालयों, चैत्यालयों में अभिषेक, शांतिधारा अर्घ्य आदि विधान किए जाएंगे। श्रीफल जैन न्यूज की इस श्रंखला में आज उपसंपादक प्रीतम लखवाल की ओर से संकलित और संपादित यह विशेष प्रस्तुति पढ़िए…
भगवान श्री वासुपूज्य जी का गर्भ और जन्म कल्याणक
इंदौर। जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य जी का जन्म कल्याणक और तप कल्याणक पूरे भारत वर्ष में धूमधाम से मनाया जाएगा। 27 फरवरी को फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन यह शुभ अवसर आया है। इस दिन संपूर्ण भारत वर्ष के दिगंबर जैन मंदिर और चैत्यालयों में अभिषेक और शांतिधारा के अलावा अष्ट द्रव्यों से अर्घ्य आदि विधान भी होंगे। यहां भगवान के जन्म और तप के बारे में जानते हैं। पुष्करार्ध द्वीप के पूर्व मेरू की ओर सीता नदी के दक्षिण तट पर वत्सकावती नाम का देश है। उसके अतिशय प्रसिद्ध रत्नपुर नगर में पद्मोत्तर नाम के राजा राज था। किसी दिन मनोहर नाम के पर्वत पर युगंधर जिनेंद्र विराजमान थे। पद्मोत्तर राजा वहां जाकर भक्ति, स्तोत्र, पूजा आदि करके अनुप्रेक्षाओं का चिंतवन करते हुए दीक्षित हो गए। ग्यारह अंगों का अध्ययन करके दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं की संपत्ति से तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया। जिससे महाशुक्र विमान में महाशुक्र नामका इंद्र हुआ। इस जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में चंपानगर में ‘अंग’ नाम का देश है। जिसका राजा वासुपूज्य था और रानी जयावती थी। आषाढ़ कृष्ण षष्ठी के दिन रानी ने पूर्वाेक्त इंद्र को गर्भ में धारण किया और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन पुण्यशाली पुत्र को जन्म दिया। इंद्र ने जन्म उत्सव करके पुत्र का ‘वासुपूज्य’ नाम रखा। जब कुमार काल के 18 लाख वर्ष बीत गए। तब संसार से विरक्त होकर भगवान जगत के यथार्थ स्वरूप का विचार करने लगे। तत्क्षण ही देवों के आगमन हो जाने पर देवों द्वारा निर्मित पालकी पर सवार होकर मनोहर नामक उद्यान में पहुंचे और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन 676 राजाओं के साथ स्वयं दीक्षित हो गए।
भगवान का केवल ज्ञान और मोक्ष
छद्मस्थ अवस्था का एक वर्ष बीत जाने के बाद भगवान ने कदंब वृक्ष के नीचे बैठकर माघ शुक्ल द्वितीया के दिन सायंकाल में केवलज्ञान प्राप्त किया। भगवान बहुत समय तक आर्यखंड में विहार कर चंपानगरी में आकर एक वर्ष तक रहे। जब आयु में एक माह शेष रह गया। तब योग निरोध कर रजत मालिका नामक नदी के किनारे की भूमि पर वर्तमान चंपापुरी नगरी में स्थित मंदारगिरि के शिखर को सुशोभित करने वाले मनोहर उद्यान में पर्यंकासन से स्थित होकर भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी के दिन 94 मुनियों के साथ मुक्ति को प्राप्त हुए।













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