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10वें तीर्थंकर श्री शीतलनाथ का 26 जनवरी को जन्म और तप कल्याणकः जैन धर्म के सिद्धांतों को जन जन तक पहुंचाया


जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर भगवान श्री शीतलनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 26 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन मंदिरों में महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा, भक्तामर पाठ सहित अन्य विधान होंगे। भगवान श्री शीतलनाथ का जन्म माघ कृष्ण द्वादशी को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में महारानी सुनंदा देवी के गर्भ से जन्म हुआ था। उनका तप कल्याणक भी इसी दिन है। भगवान श्री शीतलनाथ के जीवन पर आधारित यह जानकारी श्रीफल जैन न्यूज जैन समाज के भक्तों के लिए सहेजकर लाया है। आप भी पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की यह स्पेशल रिपोर्ट….


इंदौर। भगवान श्री शीतलनाथ का जन्म माघ कृष्ण द्वाद्वशी को पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में महारानी सुनंदा देवी के गर्भ से जन्म हुआ था। उनका तप कल्याणक भी इसी दिन है। इधर, भगवान का जन्म हुआ और उधर स्वर्ग सौधर्मेंद्र शची के साथ धरती पर आ पहुंचे मेरु पर्वत की पांडुकशिला पर जन्माभिषेक के लिए। जैन धर्मशास्त्रों में वर्णित साक्ष्यों के आधार पर भगवान श्री शीतलनाथ की आयु एक लाख पूर्व वर्ष थी। तपे सोने जैसा रंग, 540 फीट लंबा कद। 25 हजार पूर्व वर्ष का कुमार काल और फिर 25 हजार पूर्व वर्ष राजपाट संभाला। फिर एक दिन हिम का नाश देखकर इसी माघ कृष्ण द्वादशी को मन में वैराग्य की भावना जागी और बस शुक्र प्रभा पालकी से सहेतुक वन पहुंचे। उनके तप की ओर बढ़ते कदमों को देखकर एक हजार और राजाओं ने दीक्षा ग्रहण की। ऐसा ज्ञात है कि भगवान श्री शीतलनाथ वर्तमान वीर नि.सं. 2548 से 39 हजार 480 वर्ष कम एक करोड़ सागर पहले मोक्ष गए हैं।

भगवान श्री शीतलनाथ का पूर्व जन्म

पुष्कर द्वीप के पूर्वार्ध भाग में मेरू पर्वत के पूर्व विदेह में सीता नदी के दक्षिण तट पर वत्स नाम का एक देश है। उसके सुसीमा नगर में पद्मगुल्म नाम का राजा रहता था। किसी समय वसंत ऋतु की शोभा समाप्त होने के बाद राजा को वैराग्य हो गया और आनंद नामक मुनिराज के पास दीक्षा लेकर विपाक सूत्र तक अंगों का अध्ययन किया। तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके आरण नामक स्वर्ग में इंद्र हो गया।

माघ कृष्ण द्वादशी के दिन स्वयं दीक्षित हुए

इस जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में मलय देश के भद्रपुर नगर का स्वामी दृढ़रथ राज्य करता था। उसकी महारानी का नाम सुनंदा था। रानी सुनंदा ने चैत्र कृष्ण अष्टमी के दिन उस आरणेंद्र को गर्भ में धारण किया। माघ कृष्ण द्वादशी के दिन भगवान श्री शीतलनाथ को जन्म दिया। भगवान ने किसी समय वन विहार करते हुए क्षणभर में पाले के समूह (कोहरा) को नष्ट हुआ देखकर राज्यभार अपने पुत्र को सौंपकर देवों द्वारा लाई गई ‘शुक्रप्रभा’ नाम की पालकी में बैठकर सहेतुक वन पहुंचे। माघ कृष्ण द्वादशी के दिन स्वयं दीक्षित हो गए। अरिष्टनगर के पुनर्वसु राजा ने प्रथम खीर का आहार दिया था।

बेल वृक्ष के नीचे हुआ केवल ज्ञान

अनंतर छद्मस्थ अवस्था के तीन वर्ष बिताकर पौष कृष्ण चतुर्दशी के दिन बेल वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान को प्राप्त कर लिया। अंत में सम्मेद शिखर पहुंचकर एक माह का योग निरोध कर अश्विन शुक्ल अष्टमी के दिन कर्म शत्रुओं को नष्ट कर मुक्तिपद को प्राप्त हुए।

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