राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधना से जनमानस को धर्म और आध्यात्म की ओर प्रेरित किया। वहीं मुनियों, साधुओं ने हिन्दी साहित्य में काव्य और भक्ति पदों के जरिये भी धर्म प्रभावना की अलख जगाई। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 11वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
इंदौर। भट्टारक श्री रत्नकीर्ति दिगंबर जैन कवियों में प्रथम कवि हैं। जिन्होंने इतनी अधिक संख्या में हिन्दी पद लिखे हैं। ऐसा मालूम होता है कि उस समय कबीरदास, सूरदास और मीरा के पदों का देश में पर्याप्त प्रचार हो गया था और उन्हें अत्यधिक चाव से गाया जाता था। इन पदों के कारण देश में भगवत भक्ति की ओर लोगों का स्वतः ही झुकाव हो रहा था। ऐसे समय में जैन साहित्य में इस कमी को पूरी करने के लिए भट्टारक श्री रत्नकीर्तिजी ने इस दिशा में प्रयास किया। आध्यात्म और भक्तिपरक पदों के साथ-साथ विरहात्मक पद भी लिखे और पाठकों के समक्ष राजुल के जीवन को एक नए रूप में प्रस्तुत किया। ऐसा लगता है कि कवि राजुल एवं नेमिनाथ की भक्ति में अधिक रुचि रखते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी कृतियां इन्हीं दो पर आधारित करके लिखीं।
नेमिनाथ गीत और नेमिनाथ बारहमासा के अतिरिक्त अपने हिन्दी पदों में राजुल नेमि के संबंध को अत्यधिक भावपूर्ण भाषा में प्रस्तुत किया। सर्वप्रथम राजुल को इन्होंने नारी के रूप में प्रस्तुत किया। विवाह होने के पूर्व की नारी की दशा और तोरणद्वार से लौट जाने पर नारी ह्दय को खोलकर अपने पदों में रख दिया। भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी की सभी रचनाएं भाषा, भाव और शैली सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ हैं। कवि हिन्दी के जबरदस्त प्रचारक थे। संस्कृत के उत्कृष्ट विद्वान होने पर भी उन्होंने हिन्दी को अधिक प्रश्रय दिया। उन्होंने राजस्थान के अलावा गुजरात में भी हिन्दी रचनाएं लिखीं। भट्टारकश्री रत्नकीर्ति के सभी शिष्य और प्रशिष्यों ने इस भाषा में लेखन जारी रखा। हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने में योगदान दिया।
भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी का जन्म और उनके कार्य
14वीं शताब्दी में जब भट्टारक बांगड़ प्रदेश में धर्म और साहित्य प्रचार कर रहे थे। उस समय वह लहर चरम पर थी। नए-नए मंदिरों का निर्माण और प्रतिष्ठा विधानों की भरमार थी। भट्टारकों, मुनियों, साधुओं, ब्रह्मचारियों और स्त्री साधुओं का विहार होता रहता था। उनके संदेश और उपदेश जन-जन को पावन किया करते थे। वे जहां भी जाते वहां की जनता पलक-पावड़े बिछा देती। उसी समय घोघानगर में हूंबड जाति के श्रेष्ठी देवीदास के यहां बालक का जन्म हुआ। माता सहजलदे विविध कलाओं से युक्त बालक को पाकर बहुत खुश हो गई। जन्मोत्सव में नगर में कई प्रकार के उत्सव किए गए।
बड़े होने पर वह विद्याध्ययन करने लगा। उसने बहुत कम समय में प्राकृत और संस्कृत ग्रंथों का गहरा अध्ययन कर लिया। एक दिन अचानक भट्टारकश्री अभयनंदी से साक्षात्कार हो गया। वे उसे देखते ही प्रसन्न हुए और उसकी विद्धत्ता और वाक चातुर्यता से प्रभावित होकर उसे अपना शिष्य बना लिया। अभयनंदी ने पहले उसे सिद्धांत, काव्य, व्याकरण, ज्योतिष एवं आयुर्वेद आदि विषयों के ग्रंथों का अध्ययन करवाया। वह व्युत्पन्नमति था इसलिए शीघ्र ही उसने उन पर अधिकार पा लिया। अध्ययन समाप्त होने के बाद अभयनंदी ने उसे अपना पट्ट शिष्य घोषित कर दिया। 32 लक्षण और 72 कलाओं से संपन्न विद्वान युवक को कौन अपना शिष्य बनाना नहीं चाहेगा। संवत 1643 में एक विशेष समारोह में उसका महाभिषेक कर दिया गया और उसका नाम रत्नकीर्ति रखा गया। इस पद पर वे संवत 1656 तक रहे।
भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी का शिष्य परिवार
भट्टारक श्री रत्नकीर्ति के कितने ही शिष्य थे। वे सभी विद्वान और साहित्य प्र्रेमी थे। इनके शिष्यों की कितनी ही कविताएं हैं। इसमें कुमुदचंद, गणेश, जय सागर, राघव के नाम उल्लेखनीय है।













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