मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने मंगलवार को धर्मसभा में समाजजनों को सृष्टि, दृष्टि और भक्ति का महत्व बताया। धर्म के विभिन्न स्वरूपों का ज्ञान भी कराया। मानसिक शक्ति को संयमित रखने का भान भी कराया। मुनिश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में समाजजन पहुंच रहे हैं। गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…
गोसलपुर मप्र। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सृष्टि अनेकांतमयी है और अनेकांत में प्रत्येक धर्म का भिन्न-भिन्न स्वरूप है, परस्पर में विरोध है। एक गुण दूसरे गुण का किंचित मात्र भी कार्य नहीं करता। भिन्न-भिन्न स्वभाव वाले हैं और जब भिन्न-भिन्न स्वभाव हो तो फिर दोनों में एकरूपता लाना बहुत कठिन हो जाता है और एकरूपता लाने से सृष्टि की व्यवस्था बिगड़ जाएगी क्योंकि, सृष्टि में नाना प्रकार के मोह हैं और एक द्रव्य का भी एक कार्य नहीं है, जितने कार्य है, उतने कारण हैं। कार्य जो हैं परस्पर विरोधी कार्य हैं। अपनी जिंदगी में भी हमें सुबह से शाम तक कितने विरोधी कार्य करने पड़ते हैं। हमें सोना भी है और जागना भी है, जब हम खुद अपनी इच्छाओं में एकरूपता नहीं दे पा रहे हैं तो दुनिया को एकरूप करने का प्रयास कैसे कर सकते हैं, ये है तत्वचिंतन और इसी तत्वचिंतन से हम जैन धर्म के अनेकांत धर्म को समझेंगे।
भगवान कहते हैं कि कषायों को छोड़
समंतभद्र स्वामी कहते हैं कि दुनिया के विरोध की अपेक्षा तू स्वयं को देख, तेरी इच्छाएं परस्पर में कितनी विरुद्ध है। तेरी चाहत देख, एक क्षण में कुछ चाहता है, एक क्षण में बिल्कुल उल्टा चाहता है। जब तेरी इच्छाएं विरोध में हैं तो दुनिया के विरोध को क्यों विरोध मान रहा है। दुनिया को क्यों कह रहा है कि ये मित्र है और ये दुश्मन है। हमारी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए ही सारी दुनिया में विरोध हुआ, यदि हमारी इच्छाये एक समान हो जाए। भाई-भाई की इच्छाएं नहीं मिल रही है, यहां तक की भगवान व भक्त की एकता नही हो रही। भगवान कहते हैं कि कषायों को छोड़ और संसारी प्राणी कहता है कि मैं जब क्रोध करूं तो उसमें सफल हो जाऊं।
दूसरों को मारने का भाव करना भी पाप है
जैनदर्शन का जितना निकटवर्ती फॉलोअर होगा। उसको उतना ही कहा कि तुम्हें किसी जीव को मारने का भाव नहीं करना तो वह मुझे मार देगा तो मर जाओ। जितना बड़ा साधु, जैनी होता जाता है उतने ही उसके बचने के उपाय खत्म कर दिए, यहां तक कि मंत्र तंत्र का निषेध कर दिया। विश्व का एक दर्शन है जो कहता है कि मरने में कोई पाप नहीं है, लेकिन दूसरों को मारने का भाव करना भी पाप है। एक में मारना पड़ेगा, एक में मरना पड़ेगा तो साधु से कह दिया मर जाओ लेकिन मारने का भाव नहीं करना। तुम्हें कोई कितना ही कष्ट देवे, तुम उसे कष्ट देने का भाव नहीं करना, अपन भगवान के अनुसार ही नहीं चल पा रहे हैं, कहो मैं किसी के अनुसार नहीं चलूंगा आप जो कहोगे नहीं करूंगा, बस जिस दिन अपनी संकल्प कर लेंगे उसे दिन भगवान की जरूरत नहीं पड़ेगी, हम खुद भगवान बन जाएंगे।
तुम आंख बंद करके उस भगवान को याद कर लेना
भक्ति का अर्थ मात्र जय-जयकार बोलना या पूजा पाठ नहीं है, है तो मात्र साधन है। वास्तविक भक्ति का अर्थ होता है कि जिसकी जय बोल रहे हो उसके अनुसार चलना, जिसको मैं चाहता हूँ, जिसकी मैं भक्ति करता हूं, उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई भी कार्य नहीं करूंगा, चाहे मुझे मिटना पड़े तो मिट जाऊंगा, बस भगवान की सिद्धि हो जाएगी। भगवान के मंदिर में मात्र तुम्हे इतना कहना है निःसहि-3, कर लीजिए संकल्प कि भगवान जब तक मैं मंदिर के अंदर आ गया हूँ, जब तक मेरी पूजा नहीं होगी, जब तक मैं मंदिर की पूरी विधि नहीं कर लूंगा, मैं कोई भी राग द्वेष मोह कषाय आदि भाव नहीं रखूंगा, तेरे और मेरे अलावा इस मंदिर में जब तक हूं, कोई नहीं रहेगा। कोई रिश्तेदार, परिवार, माँ बाप नहीं, कुछ नहीं, तू और मैं बस और किसी को नही पहचानता। 6 महीने ये प्रयोग करके लीजिए देख, गारंटी से कह रहा हूं कि तुम्हें भगवान इतना सिद्ध हो जाएगा कि तुम जंगल में भी हो, जहां तुम्हें कोई बचाने वाला नहीं है, तुम आंख बंद करके उस भगवान को याद कर लेना, भगवान आकाश से विमान भेज करके तुझे बचा लेगा। जब आप भगवान के दर्शन, वंदना या पूजा करने के उद्देश्य से गए है, चाहे आप 5 मिनिट के लिए या घण्टे भर के लिए उस समय में मंदिर के अंदर राग द्वेष नहीं करूँगा, चाहे मेरा परम दुश्मन आ जाये या मेरा परम हितेषी आ जाये।
मंदिर के अंदर, हम कानों से बुरा नहीं सुनेंगे
यदि आपने मंदिर में मोबाइल स्विच ऑफ नहीं किया तो आपके मंदिर जाने से कोई फायदा नहीं, ये है तुम्हारे सिद्धि में, भक्ति में, चमत्कार में बाधक। साइलेंट कर दो बाद में जाकर सुन लेना। मंदिर के अंदर आपके मोबाइल की घंटी नहीं बजाना चाहिए। वाइब्रेशन पर भी नहीं रखना, आपको मालूम ही नहीं चलना चाहिए, मात्र मंदिर के अंदर, हम कानों से बुरा नहीं सुनेंगे। कोई भी आये मैं नहीं बोलूंगा क्योंकि इस समय मैं मंदिर में गया हूँ, मन वचन काया से। इतना बलिदान करो तो तुम्हे पूजा सिद्ध हो जाएगी। मंदिर के अंदर तो कम से कम भगवान के, मंदिर के अनुसार चलो।













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