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मुनि श्री प्रणीत सागर जी का मंगल प्रवेश: श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में दी देशना 


मुनि श्री प्रणीत सागर जी का सिलीकॉन सिटी इंदौर से विहार कर श्री महावीर मंदिर परिवहन नगर आगमन हुआ। समाज जनों ने मुनि संघ की अगवानी की। जगह-जगह मुनि श्री के चरण प्रक्षालन किए गए। मुनि श्री ने जिनालय के दर्शन किए। श्रीजी के अभिषेक एवं शांतिधारा मुनि श्री के मुखारबिंद से हुई। इंदौर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


इंदौर। नगर गौरव नवीन पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर से दीक्षित मुनि श्री प्रणीत सागर जी का सिलीकॉन सिटी इंदौर से विहार कर श्री महावीर मंदिर परिवहन नगर आगमन हुआ। अध्यक्ष नवनीत जैन सहित अनेक समाज जनों ने मुनि संघ की अगवानी की। जगह-जगह मुनि श्री के चरण प्रक्षालन किए गए। मुनि श्री ने जिनालय के दर्शन किए। श्रीजी के अभिषेक एवं शांतिधारा मुनि श्री के मुखारबिंद से हुई। राजेश पंचोलिया और नवनीत जैन ने बताया कि इस अवसर पर मुनि श्री प्रणीत सागर जी ने श्रावकों के प्रमुख कर्तव्य, श्रीजी के दर्शन, अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय, दान आदि पर विस्तृत विवेचना कर बताया कि श्रावक को किस प्रकार विनय करना चाहिए।

विनय में लोकानुवृति, अर्थ काम भय मोक्ष है। विनय का अभाव है तो वह गलत होता है। मुनिराज द्वारा मुलाचार ग्रंथ के आधार पर टीका की विवेचना की जा रही है। इसमें श्रावकाचार और साधुओं के लिए श्रमणाचार का वर्णन है। श्रावकों को उठने, बैठने खाने-पीने चलने-देखने और सोने, स्वाध्याय के समय विनय रखना चाहिए। मुनिश्री ने ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप और उपचार यह विनय के गुण बताए।

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