आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के शिष्य मुनि श्री आदित्य सागरजी, मुनि श्री अप्रमित सागरजी, मुनि श्री सहज सागरजी, क्षुल्लक श्री श्रेयांश सागरजी ससंघ का सोमवार को बूंदी का गोठड़ा में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। धर्मावलंबियों ने पेट्रोल पंप पर मुनि संघ की अगवानी कर पाद प्रक्षालन किया एवं आरती उतारी। मुनि संघ को जुलूस के रूप में बैंडबाजों के साथ नगर भ्रमण कराते हुए दिगंबर जैन पार्श्वनाथ मंदिर लाया गया। बूंदी का गोठड़ा से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
बूंदी का गोठड़ा। आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के शिष्य मुनि श्री आदित्य सागरजी, मुनि श्री अप्रमित सागरजी, मुनि श्री सहज सागरजी, क्षुल्लक श्री श्रेयांश सागरजी ससंघ का सोमवार को बूंदी का गोठड़ा में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। धर्मावलंबियों ने कस्बे से बाहर पेट्रोल पंप पर पहुंचकर मुनि संघ की अगवानी कर पाद प्रक्षालन किया एवं आरती उतारी। इसके बाद श्रद्धालु ने मुनि संघ को जुलूस के रूप में बैंडबाजों के साथ नगर भ्रमण कराते हुए दिगंबर जैन पार्श्वनाथ मंदिर लाया गया। जहां पर मुनि संघ ने श्रीजी के दर्शन किए। जगह श्रद्धालुओं ने मुनि संघ की अगवानी में स्वागत द्वार बनाए। रंगोलिया सजाई और आरती की।
भक्त कभी गुरु से एवं भगवान से अपेक्षाएं नहीं रखता
श्री पार्श्वनाथ दिगंबर मांगलिक भवन में मुनिश्री ने प्रवचन करते हुए कहा कि ऊंचाई प्राप्त करने के लिए तपना पड़ता है। सरलता से जो मिलता है उसकी कीमत कम होती है। मिलता वही है, जो आपके भाग्य में है जबकि, आप इच्छाएं बड़ी-बड़ी कर लेते हैं। यदि आपकी अपेक्षाएं पूरी नहीं होती है तो आपकी श्रद्धा गुरु एवं भगवान के प्रति टूट जाती है। जो सच्ची श्रद्धा रखता है वही सच्चा भक्त होता है। भक्त कभी गुरु से एवं भगवान से अपेक्षाएं नहीं रखता बल्कि गुरु एवं भगवान के प्रति श्रद्धा बनाकर रखता है। पुरुषार्थ उत्तम हो तभी गुरु का आशीर्वाद मिलता है।
बिना भाग्य के कुछ नहीं मिलता
कभी भी गुरु से ज्यादा अपेक्षाएं मत करना अपेक्षा पूरी ना हो तो काहे का गुरु एवं काहे का भगवान, बिना श्रद्धा के आप खाली डिब्बे के समान हैं। बुरे लोगों से समाज का बहुत बड़ा नुकसान होता है जबकि, बुरे लोग समाज में नाम मात्र के होते हैं, जो दिल से उतर गया वो उतर गया फिर गुरु वापस मुड़कर नहीं देखते हैं। बिना भाग्य के कुछ नहीं मिलता गुरुओं के सामने भक्तों की आज्ञा नहीं चलती। सच्चा भक्त हमेशा गुरुओं की आज्ञा का पालन करते हैं तो गुरु भी भक्तों के लिए कुछ भी त्याग करने को तैयार रहते हैं फिर मार्ग की दूरी नहीं नापी जाती है।













Add Comment