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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : आत्मा में राग-द्वेष युक्त भावों का उत्पन्न होना हिंसा है- आर्यिका विभा श्री 


गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान कहा कि समुद्र का जल तो शांत होता है, उसमें हवा के द्वारा लहरें उत्पन्न होती है। हवा के संयोग से , वायु के निमित्त से लम्बी-लम्बी लहरें उत्पन्न होती हैं। उसी प्रकार आत्मा तो शांत है मगर राग द्वेष और कर्मों के संयोग से उसमें जो लहरें उठती हैं वह आत्मा के अशांत होने का कारण है। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…


रांची। गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान कहा कि समुद्र का जल तो शांत होता है, उसमें हवा के द्वारा लहरें उत्पन्न होती है। हवा के संयोग से , वायु के निमित्त से लम्बी-लम्बी लहरें उत्पन्न होती हैं। उसी प्रकार आत्मा तो शांत है मगर राग द्वेष और कर्मों के संयोग से उसमें जो लहरें उठती हैं वह आत्मा के अशांत होने का कारण है। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह , छल – कपट यह सब हमारी आत्मा के गुण नहीं है। क्रोध ,मान, माया, लोभ कषाय के निमित्त से आत्मा में जो लहरें उत्पन्न होती है उसे लेश्या कहते हैं। जब तक इस जीव को सम्यक दर्शन नहीं होगा तब तक धर्म ध्यान की शुरुआत नहीं होती है। मिथ्यादृष्टि का ध्यान आर्तध्यान या रौद्रध्यान ही होता है।

 रौद्रध्यान के चार प्रकार 

रौद्रध्यान के चार प्रकार हैं हिंसानदी, मृषानंदी, चौर्यानंदी, परिग्रहानंदी। हिंसा करने की योजनायें बनाना और हिंसा करने के बाद आनंद मनाना हिंसानंदी रौद्रध्यान कहलाता हैं, जैसे मच्छरों को भगाने के लिए अगरबत्ती लगाना, कपड़ों को अच्छी तरह साफ करके, शैम्पू से बालों को साफ करके, लिपस्टिक, नैल पॉलिश आदि लगाने का काम करके आनन्द मनाना हिसानंदी रौद्रध्यान कहलाता है। जो हिंसा कर उसमे आनंदित होते है उनके हिंसानंदी रौद्रध्यान होता है! जैसे कोई मांसाहार का सेवन कर आनंदित होता है। कोई हिंसात्मक वस्तु का व्यापार से लाभ कमाकर आनन्दित होता है तो उसके हिंसानंदी ऱौद्रध्यान होता है। हिंसा करनी पड़ रही है इस बात से या और जानबूझ कर प्रसन्न हो रहे है उससे हिंसा करने का पाप करोड़ों गुना बढ़ जाता है। यदि हिंसा कर उसका पश्चाताप करता है तो हिंसा का पाप 99 % घट जाता है। व्यापार में हिंसा, झूठ, परिग्रह सब पाप होते हैं लेकिन हम इन पापों को पश्चाताप विवेक पूर्वक करें, भगवान के सामने अपने पापों की निन्दा आलोचना करें और भगवान से प्रार्थना करें कि वह दिन कब आएगा जब मैं इन पापों को छोड़कर धर्म के मार्ग पर चल सकेंगे। जीवन चलाने के लिये पाँच पाप तो करने पड़ते है परन्तु उसका पश्चाताप करके भी हम अपनी आत्मा का कल्याण कर सकते हैं । धर्म ध्यान करके एक दिन स्वर्ग और निर्वाण की प्राप्ति कर सकते है।

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