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अनंत चतुर्दशी पर होगा लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान और भव्य शोभायात्रा: आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने प्रवचन में समझाया आकिंचन धर्म का महत्व


रामगंजमंडी में अनंत चतुर्दशी के अवसर पर दशलक्षण महापर्व का समापन भव्य शोभायात्रा, लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान, अभिषेक और प्रवचनों के साथ होगा। आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने अपने उपदेश में आकिंचन धर्म की गहराई को समझाते हुए अनासक्त भाव की महत्ता बताई। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की ख़ास रिपोर्ट…


रामगंजमंडी में इस वर्ष अनंत चतुर्दशी का पर्व विशेष धार्मिक उल्लास और भक्ति भावना के साथ मनाया जाएगा। दस लक्षण महापर्व का यह अंतिम दिन अनेक धार्मिक आयोजनों का साक्षी बनेगा। कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीजी के अभिषेक और शांति धारा से होगा। आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर जी महाराज के सानिध्य में प्रवचन भवन में मंगल प्रवचन होंगे, जिसमें गुरुदेव उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर प्रकाश डालेंगे।

प्रवचन उपरांत तीन घंटे का लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान संपन्न होगा। विधान की तैयारियां समाज द्वारा पूर्ण कर ली गई हैं। दोपहर की बेला में नगर में भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी जो विभिन्न मार्गों से होकर पुनः मंदिर प्रांगण में पहुंचेगी। संध्या बेला में प्रतिक्रमण और रात्रि प्रवचन के साथ महापर्व का समापन होगा।

समाज के संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया एवं कमल लुहाड़िया, महामंत्री राजकुमार गंगवाल तथा मंत्री राजीव बाकलीवाल ने संयुक्त रूप से जानकारी दी कि अनंत चतुर्दशी के अगले दिन 7 सितंबर को तपस्वियों का पारणा आचार्य श्री के सानिध्य में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन धर्मशाला में भव्यता के साथ सम्पन्न होगा।

आकिंचन तक की यात्रा आत्मा को निर्मल और स्वच्छ बनाती

नवम दिवस पर आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने उत्तम आकिंचन धर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब व्यक्ति के जीवन में अनासक्त भाव होता है तभी वह आकिंचन को प्राप्त करता है। उन्होंने समझाया कि देह और संसार का कोई भी पदार्थ अपना नहीं है। पर्यूषण पर्व आत्मा की सफाई का अभियान है—क्षमा से प्रारंभ होकर आकिंचन तक की यात्रा आत्मा को निर्मल और स्वच्छ बनाती है। गुरुदेव ने कहा कि जैसे कोरोना महामारी में मृत्यु के आंकड़े सुनने के बावजूद वैराग्य जागृत नहीं हुआ, उसी प्रकार जब तक त्याग अनासक्त भाव से नहीं होता, तब तक आकिंचन धर्म की प्राप्ति संभव नहीं है। वस्तु या देह के प्रति मोह जब तक मन और शरीर से पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक आकिंचन धर्म आत्मा में प्रवेश नहीं करता।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बनारस, गया और प्रयागराज के घाटों पर मृतकों का अंतिम संस्कार देखना ही सिखा देता है कि इस संसार में किसी भी वस्तु पर अधिकार नहीं है। यही भाव आकिंचन धर्म की आत्मा है।

भक्ति और उत्सव का माहौल

अभिषेक और शांति धारा के दौरान भक्तजन भक्ति नृत्य और स्तुति गीतों में भाव-विभोर दिखाई दिए। आचार्य श्री की आरती और इंद्रध्वज मंडल के आयोजन ने वातावरण को और भी दिव्य बना दिया। रात्रि को सभी तपस्वियों की अनुमोदना के साथ समाजजन ने भक्ति का कार्यक्रम आयोजित किया।

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