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संल्लेखना समाधि धर्म आचरण कर जीवन को सार्थक करने का उपक्रम : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने की सिद्ध भक्ति 


17 मार्च को मुनि श्री प्रशम सागर जी की समाधि हुई। 19 मार्च को समाधिस्थल पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित गए। वहां पर सिद्ध भक्ति की। मुनि श्री पुण्य सागर जी से दीक्षित मुनि श्री पूर्ण सागर जी क्रमश आहार सामग्री का त्याग कर कर संल्लेखना की ओर अग्रसर हैं। आचार्य श्री ने उन्हें भी संबोधन दिया। पढ़िए धरियावद से राजेश पंचोलिया की यह खबर…


धरियावद। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी मुनि श्री पुण्य सागर जी 52 साधुओं सहित विराजित हैं। 17 मार्च को मुनि श्री प्रशम सागर जी की समाधि हुई। 19 मार्च को समाधिस्थल पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित गए। वहां पर सिद्ध भक्ति की। मुनि श्री पुण्य सागर जी से दीक्षित मुनि श्री पूर्ण सागर जी क्रमश आहार सामग्री का त्याग कर कर संल्लेखना की ओर अग्रसर हैं। आपने सभी प्रकार के अन्न का त्याग कर मात्र मुनक्का पानी और जल ले रहे हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी मुनि पुण्य सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी निरंतर संबोधित कर रहे हैं। आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि शास्त्रों में संल्लेखना समाधि की प्रक्रिया बताई गई है। शास्त्रों में वर्णन है कि जीवन को कैसे जिया जाए संल्लेखना समाधि धर्म का आचरण कर जीवन को सार्थक करने का उपक्रम है।

संल्लेखना समाधि में कषायों को क्रश किया जाता है

शरीर के माध्यम से व्रत संयम किए जाते हैं। शरीर जब तप और संयम में बाधा उत्पन्न करता है। कमजोरी आती है तब शास्त्रों में बताई विधि अनुसार क्रमशः नियम और यम संल्लेखना के माध्यम से व्रत-उपवास आहार में क्रमश त्याग कर शरीर को क्रश किया जाता है। संल्लेखना समाधि में कषायों को भी क्रश किया जाता है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मुनि श्री पूर्ण सागर जी को संबोधित कर कही।राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने आगे बताया कि धर्म की रक्षा के लिए साधु आत्मा को महत्व देते हैं।

संल्लेखना सामान्य बात नहीं

शरीर संयम के पालन में बाधक होने पर क्रमशः त्याग करते हैं और यह विधि अरिहंत भगवान ने अपनी देशना में बताई, जो गणधर स्वामी ने लिपिबद्ध कर शास्त्रों में अंकित की है। संल्लेखना सामान्य बात नहीं है। यह जैन धर्म में संयम मार्ग की परंपरा है। क्षपक साधु की उत्कृष्ट संल्लेखना होने पर अगले 2 भव से 8 भव्य में मोक्ष की प्राप्ति होती हैं। क्षपक साधु के दर्शन करना तीर्थ यात्रा समान है।

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