गणिनी आर्यिका विभा श्री माता जी के सानिध्य में प्रातः काल जिनसहस्रनाम के मंत्रों से शांतिधारा और सिद्धों की आराधना की गई। इस अवसर पर मंत्रोच्चार द्वारा सातवें दिन 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। पूज्य माता जी ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि धर्म का मूल, धर्म का आधार, धर्म का प्राण, धर्म की जान, धर्म की आत्मा, धर्म की उपजाऊ भूमि, धर्म की शक्ति यह एक मात्र सम्यक दर्शन है। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…
रांची। गणिनी आर्यिका विभा श्री माता जी के सानिध्य में प्रातः काल जिनसहस्रनाम के मंत्रों से शांतिधारा और सिद्धों की आराधना की गई। इस अवसर पर मंत्रोच्चार द्वारा सातवें दिन 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। पूज्य माता जी ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि धर्म का मूल, धर्म का आधार, धर्म का प्राण, धर्म की जान, धर्म की आत्मा, धर्म की उपजाऊ भूमि, धर्म की शक्ति यह एक मात्र सम्यक दर्शन है। दर्शन का अर्थ दिखना है लेकिन यह मोक्ष मार्ग का प्रकरण है। इसीलिए दर्शन का अर्थ देखना नहीं है, दर्शन का अर्थ है श्रद्धा, विश्वास, आस्था, प्रतीति, रुचि। गणित के क्षेत्र में जो महत्व अंक का है, वह महत्व धर्म के क्षेत्र में सम्यक दर्शन का है। अंक के बिना शून्य का क्या महत्व हो सकता है, जिस तरह चेक पर शून्य – शून्य लिख दिये हों और यदि अंक नहीं लिखा है तो चेक की कोई कीमत नहीं है, उसी तरह से अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यह सब सम्यक दर्शन के बिना शून्य हैं। जो पदार्थ जिस रूप में है, उसी रूप में श्रद्धा होना,अरिहंत आदि में भक्ति होना सम्यकत्व है।
मार्ग नहीं होता अशुद्ध
माताजी ने कहा कि आज सम्यक दर्शन के पांचवे अंग उपगूहन अंग की ओर दृष्टिपात करना है। जब तक श्रद्धा नहीं होगी, तब उपगूहन अंग असम्भव है। कषायों की तीव्रता इतनी है कि श्रद्धा पैदा होने नहीं देती मार्ग के प्रति निःशक्ति होते हुए और मार्ग के फल के प्रति अंतरंग भावना से निःशक्त होकर मार्ग में चलते समय कितनी भी कठिनाइयां आएं, गुणों को प्रकट कर दोषों को दूर कर देना ही उपगूहन अंग है। मार्ग कभी भी अशुद्ध नहीं होता। इस मोक्ष मार्ग के अलावा अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं है, निर्वाण प्राप्ति के लिए सबसे पहले श्रद्धा, मार्ग के फल की प्रति होनी चाहिए। बाल और आसक्त लोगों के द्वारा जो धर्म की, धर्मात्माओं के द्वारा निंदा, दोष, गंदगी पैदा हो जाती है, उसका जो प्रमार्जन करता है उसके दोषों को छिपाना, गुणों को ग्रहण करना उपगूहण अंग है। संध्या आरती का सौभाग्य जितेन्द्र कुमार छाबड़ा सीए की बहनों को प्राप्त हुआ।
इन्हें मिला सौभाग्य
आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि को जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में निर्वाण लाडू समर्पित करने का सौभाग्य कान्ति कुमार, विकास कुमार गंगवाल परिवार को मिला। पाद प्रक्षालन करने का सौभाग्य धर्मचन्द राजकुमार, बबिता अजमेरा को मिला। शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य महेन्द्र कुमार, मनीष कुमार, राकेश कुमार छाबड़ा परिवार को मिला।
धार्मिक कार्यक्रम होंगे
सोमवार को विधान के अंतिम दिन 1024 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। विधान पूजन के उपरान्त विश्व शांति की कामना के लिए महायज्ञ (हवन )किया जाएगा। वहीं आगामी 24 अक्टूबर को आर्यिका माताजी संघ की 9 आर्यिका माताजी के दीक्षा अवतरण पर प्रातः काल से ही अनेक कार्यक्रम आयोजित होंगे।














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