दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -70 अहंकार छोड़ना सबसे ज्यादा जरूरी : आत्मा के परमात्मा में लीन से सारा दुख समाप्त हो जाता है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 70वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


हैरत हैरत है सखी, रह्म कबीर हिराई।

बूंद समानी समुद्र में, सोकत हेरी जाइ।।


इस दोहे में कबीर दास जी आत्मा और परमात्मा के मिलन की बात कर रहे हैं। उन्होंने इसे एक जल-बूंद और समुद्र के उदाहरण से समझाया है।

जिस प्रकार एक बूंद जब समुद्र में मिल जाती है, तो उसकी अलग पहचान समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार जब आत्मा परमात्मा में लीन होती है, तो वह फिर से जन्म-मरण के चक्र में नहीं आती। यह आत्मा की परम अवस्था है, जिसे मोक्ष कहा जाता है।

कबीर कहते हैं कि जब यह मिलन होता है, तो देखने वाला (साधक) विस्मय में पड़ जाता है—”हैरत हैरत” अर्थात् अत्यंत आश्चर्य होता है। यह मिलन समझना भी कठिन है और अनुभव करना भी दुर्लभ है।

यह दोहा अहंकार के मिटने की अवस्था को भी दर्शाता है। जब व्यक्ति यह पहचान लेता है कि उसका अलग से कोई अस्तित्व नहीं है, वह उसी ब्रह्म का अंश है, तब उसका “मैं” समाप्त हो जाता है।

जब आत्मा परमात्मा में लीन होती है, तब यह संसार का सारा दुख-दर्द समाप्त हो जाता है। कबीर कहते हैं कि इस मिलन को देखकर “सोकत हेरी जाइ”—अर्थात् जो इसे अनुभव करता है, वह विस्मित रह जाता है, क्योंकि उसे परम आनंद की अनुभूति होती है। यह वह अवस्था है, जहाँ दुख, मोह, माया और जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।

यह दोहा हमें अहंकार छोड़कर ईश्वर में लीन होने, समाज में समरसता बनाए रखने, भक्ति में पूर्ण समर्पण करने और आत्मबोध की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में हमारी असली पहचान भौतिक अस्तित्व से नहीं, बल्कि आत्मा और उसके उच्चतम स्वरूप से जुड़ी हुई है।

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