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परिग्रह मुक्ति का मंगलकारी मुहूर्त है आकिंचन्य धर्म-मुनि विश्वसूर्य सागर जी : संपूर्ण परिग्रह का त्याग ही आकिंचन्य धर्म : मुनि साध्य सागर जी


सनावद में चल रहे चातुर्मास के दौरान पर्यूषण पर्व के 9वें दिन संत निलय में मुनि साध्य सागर जी महाराज और मुनि विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने ‘उत्तम आकिंचन्य धर्म’ पर प्रवचन देते हुए परिग्रह त्याग और आत्मा की शुद्धि का संदेश दिया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


सनावद। पर्यूषण पर्व के 9वें दिन नगर के संत निलय में चातुर्मासरत मुनि साध्य सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को आकिंचन्य धर्म की महिमा समझाते हुए कहा कि आत्मा के अतिरिक्त इस लोक में कुछ भी मेरा नहीं है, यही आकिंचन्य की परिभाषा है। जब यह भाव सच्ची श्रद्धा के साथ जागृत होता है, तब यह ‘उत्तम आकिंचन्य धर्म’ कहलाता है।

उन्होंने कहा कि आकिंचन्य वह अवस्था है, जहां बाहरी परिग्रह ही नहीं, बल्कि आंतरिक संकल्प-विकल्प भी समाप्त हो जाते हैं। इसी क्रम में मुनि विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि आकिंचन्य धर्म साधना का पवित्र दिवस है, यह परिग्रह मुक्ति का मंगलकारी मुहूर्त है। जब जीव ममता, लोभ और अहंकार का त्याग करता है, तभी वह संसार सागर से पार हो सकता है।

इस अवसर पर संत भवन में सुगंधी कलश और शांति धारा का आयोजन हुआ, जिसमें आशीष कुमार मोतीचंद जैन रेवाड़ा परिवार को सौभाग्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

अनंत चतुर्दशी पर्व का आयोजन

आज नगर के आदिनाथ जिनालय, सुपार्श्वनाथ जिनालय और पार्श्वनाथ जिनालय में युगल मुनि राज के सानिध्य में श्रीजी का अभिषेक कर अनंत चतुर्दशी पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा।

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