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चातुर्मास प्रवचन में मुनि श्री अजित सूरीश्वरजी का राष्ट्र नीति पर चिंतन : शतावधान” कार्यक्रम में होगा ध्यान, राष्ट्र और संस्कृति का संगम


इंदौर के तिलक नगर में चातुर्मास कर रहे जैन संत अजित सूरीश्वर जी ने राष्ट्र नीति और सामाजिक अव्यवस्थाओं पर विचार रखते हुए चन्द्रगुप्त मौर्य युग की नीति को आदर्श बताया। आगामी रविवार को ‘शतावधान’ आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन होगा। पढ़िए ओम पाटोदी की ख़ास रिपोर्ट…


इंदौर। राष्ट्र निर्माण में आदर्शवाद और कल्पनावाद को बड़ी बाधाएं बताते हुए चातुर्मासरत जैन संत सहस्त्रवधानी मुनि श्री अजित सूरीश्वर जी महाराज ने कहा कि “मैं और मेरा राष्ट्र” विषय पर चिंतन करते हुए भारत को सुरक्षित और भयमुक्त बनाने के लिए व्यावहारिक राष्ट्र नीति की आवश्यकता है।

पृथ्वीराज एक बार हारा, तो पराजय स्थायी हो गई

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मोहम्मद गौरी को 16 बार हराने के बावजूद आदर्शवाद के चलते छोड़ दिया गया और जब पृथ्वीराज एक बार हारा, तो पराजय स्थायी हो गई। इसी तरह कल्पनावाद से प्रेरित होकर हम अग्नि को यज्ञ से शांत करना चाहते हैं, जबकि आवश्यकता यथार्थवादी पुरुषार्थ की है।

मुनि श्री ने कहा कि रामराज्य की बात तब तक संभव नहीं, जब तक राष्ट्र भयमुक्त नहीं होगा। चन्द्रगुप्त मौर्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब विदेशी आक्रमणकारी लगातार आ रहे थे, तब उनकी सुदृढ़ राष्ट्र नीति ने न केवल राष्ट्र की रक्षा की, बल्कि उसका विस्तार भी किया।

राचीन भारतीय ध्यान साधना और मानसिक विकास की क्षमता को प्रदर्शित करेगा

इस जानकारी को साझा करते हुए वर्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि अब तक मुनि श्री तीन सामाजिक विषयों पर व्याख्यान दे चुके हैं और आगामी 10 अगस्त, रविवार को प्रातः 9 बजे अभय प्रशाल में “शतावधान” कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन प्राचीन भारतीय ध्यान साधना और मानसिक विकास की क्षमता को प्रदर्शित करेगा। इस अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हुकुमचंद सांवला, वर्धमानपुर शोध संस्थान बदनावर के ओम पाटोदी एवं स्वप्निल जैन भी उपस्थित रहे। श्री सांवला ने अपने उद्बोधन में जैन समाज के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को रेखांकित किया। कार्यक्रम में समाज द्वारा उनका सम्मान भी किया गया।

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