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आचार्यश्री के वचन-साधु समाधि साधना से मरण को सुमरण बनाते हैं: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने भक्ति और साधना का महात्म्य बताया 


वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी भगवान द्वारा प्रतिपादित जिन धर्म केवलज्ञान रूपी लक्ष्मीयुक्त है। जो धर्मधारण पालन करने से मिलती है। धर्म का संग्रह और धन के संग्रह में अंतर होता है। धर्म संग्रह से पुण्य की वृद्धि होती हैं क्योंकि, धर्म मोक्ष का पथ प्रदर्शक है। यह उद्बोधन आचार्यश्री वर्धमानसागर जी महाराज ने बुधवार को धर्मसभा में दिए। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


टोंक। वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी भगवान द्वारा प्रतिपादित जिन धर्म केवलज्ञान रूपी लक्ष्मीयुक्त है। जो धर्मधारण पालन करने से मिलती है। धर्म का संग्रह और धन के संग्रह में अंतर होता है। धर्म संग्रह से पुण्य की वृद्धि होती हैं क्योंकि, धर्म मोक्ष का पथ प्रदर्शक है। धार्मिक मंडल विधान की प्रभावना से पुण्य मिलता है। आत्मा की प्रभावना संयम दीक्षा से होती है। साधु समाधि के परम लक्ष्य को लेकर संयम धारण करते हैं। समतापूर्वक साधना को समाधि कहते हैं। इससे मरण भी सुमरण हो जाता हैं। यह मंगल देशना सोलह कारण भावना पर्व पर राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्मसभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने आगे कहा कि आप लोग जन्मदिन मनाते हैं। वास्तव में साधु की दीक्षा लेते ही उसका नया जन्म प्रारंभ होता है। जितने वर्ष का जन्मदिन आप मनाते हो वास्तव में उतनी आयु आपकी कम होती जाती है। आयु हर पल हर क्षण कम होती है। जिंदगी भर आपका कार्य कैसा रहा है? इसकी परीक्षा मृत्यु अथवा संल्लेखना समाधि के समय होती है।

साधु परमेष्ठि धर्मतीर्थ होते हैं

प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज गृहस्थ और साधु जीवन में शांति के सागर रहे। उन्होंने जीवन भर समता धारण कर अनेक उपवास कर उपसर्ग, परिषह को समता से सहन किया। साधु के 10 प्रकार की विवेचना में आचार्य श्री ने बताया कि साधु की सेवा वैयावृत्ति करते समय उनके गुण ग्रहण अर्थात उनके समान वैराग्य धारण करने के भाव परिणाम रखना चाहिए। साधु की सेवा स्वाध्याय के समय आहार, विहार, निहार के समय श्रद्धा, प्रसन्नता, भक्ति, वात्सल्य एवं बिना ग्लानि के करना चाहिए क्योंकि, साधु परमेष्ठि धर्मतीर्थ होते हैं।

मुनिश्री दर्शित सागर जी के उपदेश भी हुए

सभी को रत्नाकरण श्रावकाचार और प्रथमानुयोग के ग्रंथों का स्वाध्याय कर मनन चिंतन करना चाहिए। इससे धर्म में वृद्धि होती हैं। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री दर्शित सागर जी के उपदेश हुए। बुधवार को प्रातः मुनि श्री हितेंद्र सागर जी के केशलोचन हुए। आचार्य श्री शांति सागर जी आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव के अंतर्गत आगामी 22 और 23 अगस्त को विद्वत संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री, टोंक के विधायक सहित अनेक राजनीतिक सामाजिक पदाधिकारियों के शुभकामना संदेश भी प्राप्त हो रहे हैं।

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