जिस नगर में आचार्य विराग सागर महाराज ने जन्म लिया। उसी नगरी में जन्मे अरुण भैया (बल्ले) बने वाक केसरी आचार्य विनिश्चय सागर महाराज। विनिश्चय सागर महाराज के 53वें अवतरण दिवस पर रामगंजमंडी से अभिषेक जैन लुहाडिया की यह विशेष प्रस्तुति…
रामगंजमंडी। कहते है जिन्हे मोह राग संसार चक्र से मोह नहीं होता। बस एक ही लक्ष्य होता संसार मे रहकर संसार से विरक्ति के मार्ग पर दिगम्बर मुनि बनकर मोक्षमार्ग की और अग्रसर होते हुए आत्म कल्याण करना एवम धर्म की प्रभावना करना। ऐसे ही युवा अरुण भैया (बल्ले) जिन्होंने उस धरा पर जन्म लिया। जिस धरा पर ऐसे आचार्य महाराज ने जन्म लिया। जिन्होेने अनेक युवाओं को मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर किया। वे हैं आचार्य श्री विराग सागर महाराज। जिन्होने पथरिया की माटी को अवतरित होकर धन्य किया एवं अरुण भैया (बल्ले) इन्होंने इसी धरा पर जन्म लेकर माटी को धन्य किया और वर्तमान मे वाक केसरी आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज के रूप मे मोक्षमार्ग पर अग्रसर होकर पतित को पावन बना रहे हैं। हम सभी आज गुरुदेव का 53 वां अवतरण दिवस मना रहे हैं। यह हम सभी के लिए पुण्य के क्षण हैं। इनके जीवन वृत पर यदि हम प्रकाश डाले तो जिस उम्र में युवा मौज शौक आदि में अपना समय लगा देते हं।ै उसके विपरीत इन्होने अपना जीवन संयम साधना तप की ओर अग्रसर होते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर किया। पथरिया नगरी मंे जन्मे अरुण भैया (बल्ले) का जन्म स्वर्गीय रमेशचंद जैन सराफ कुसुमदेवी की कुक्षी मंे 26 जून 1973 आषाढ़ कृष्ण द्वितीया के दिन हुआ। लौकिक शिक्षा बीए पूर्ण करने के बाद जैसा कि इनका लक्ष्य था, ये संसार चक्र के चक्रव्यूह से हटकर मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होने के लिए बढ चले। धार्मिक अध्ययन करते हुए चारों अनुयोगांे का अध्ययन पूर्ण किया। जब सन 1990 में आचार्य श्री विराग सागर महाराज के सानिध्य में पथरिया नगर मंे पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव हुआ तो मानो इन्हें नई ज्योति मिली। उसी समय इन्होंने आचार्य गुरुदेव के प्रथम दर्शन किए। जीवन संयम त्याग को बलवती करते हुए सन 1995 में ग्रह का त्याग कर दिया एवं 26 फरवरी 1995 को आहारजी क्षेत्र में आचार्य श्री विराग सागर महाराज से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया और मोक्ष मार्ग की ओर कदम बढ़ाते गए। 23फरवरी 1996 को देवेंद्रनगर जिला पन्ना मध्यप्रदेश मे आचार्य श्री विराग सागर महाराज के कर कमली से ऐलक दीक्षा हुई।
मुनि दीक्षा:- 14 दिसंबर 1998 की प्रातः बेला जब अतिशय क्षेत्र बरासो जिला भिंड मध्यप्रदेश मे पौष कृष्ण एकादशी को आचार्य श्री विराग सागर महाराज के करकमलो से सर्वाेच्च पद देते हुए मुनि दीक्षा प्रदान की गई। नामकरण करते हुए इन्हे मुनिश्री विनिश्चय सागर महाराज नाम दिया। जिस दिन मुनि दीक्षा प्रदान की गई, उस दिन उस दिन भगवान पार्श्वनाथ एवं भगवान चंद्रप्रभु का जन्म एवं तप कल्याण महोत्सव का पावन पुनीत दिन था। महाराज श्री सरल सहज स्वभाव के धनी है एवं सदा मुस्कान के साथ जिनधर्म की प्रभावना कर रहे हैं।
आचार्य पदः- आचार्य श्री विरागसागर महाराज ने उन्हें आचार्य पद देने की घोषणा 2005 में की थी और एवं 24 मई 2017 को करगुवाजी अतिशय क्षेत्र झांसी मे आचार्य श्री ने अपने कर कमलांे से ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी भगवान शांतिनाथ के जन्म तप मोक्ष कल्याण के अवसर पर प्रदान किया।
उपाधियांे से विभूषितः- आचार्य श्री की संयम साधना अभूतपूर्व है। इन्हे अनेक उपाधियांे से सुशोभित किया जा चुका है। वात्सल्य दिवाकर 11 नवंबर 2007 को भीलवाड़ा जैन समाज द्वारा प्रदान की गई। वाक्केशरी 11फरवरी 2009 को अहमदाबाद में डॉक्टर शेखरचंद जैन द्वारा सुशोभित किया गया। श्रुतवारिधि 18 फरवरी 2025 झुमरी तलैया समाज द्वारा सुशोभित किया। आचार्य श्री ने अनेक धार्मिक कार्य सम्पन्न कराए। जिनमंे शिक्षण पूजन ध्यान शिविर शिक्षक सम्मेलन सेमिनार आदि शामिल हैं। आचार्य श्री ने 12 राज्यों मे भ्रमण करते हुए जिन धर्म की अलौकिक प्रभावना की, जो अभूतपूर्व है।













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