रामगंजमंडी में 14 अगस्त की प्रातः बेला में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने अपने हाथों से केशलोच कर अद्वितीय साधना का प्रदर्शन किया। दिगंबर परंपरा के इस मूलगुण के अंतर्गत बिना किसी औजार के केश उखाड़ना कठिन तपस्या मानी जाती है। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की खास रिपोर्ट…
रामगंजमंडी — 14 अगस्त की प्रातः बेला में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने अपने हाथों से केश लोचन किया। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए गहन प्रेरणादायी रहा।
केशलोच के विषय में प्रकाश डालते हुए आपको बता दें कि दिगंबर संत स्वावलंबी होते हैं। वे किसी को भी कष्ट न देते हुए स्वयं की साधना करते हैं। चाहे कैसा भी कष्ट क्यों न हो, वे समभाव में उसे सहन करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होते हैं। केशलोच एक साधना और तपस्या है। बिना किसी औजार के हाथों से केश उखाड़ना सहज नहीं होता।
मूलगुणों में यह एक प्रमुख गुण
जैन संतों के मूलगुणों में यह एक प्रमुख गुण है। स्वयं के हाथों, बिना किसी अस्त्र के, अपने केशों को घास-फूस की तरह निकालना अपने आप में एक उत्कृष्ट साधना मानी जाती है।
साधना के मार्ग पर चलते हुए जैन संत अहिंसा व्रत के पालन के साथ ही शरीर से राग भाव को भी हटाते हैं। जब जैन संत स्वयं के हाथों केशलोच करते हैं, तो उनके चेहरे पर मुस्कुराहट देखने को मिलती है, जो पंचम युग में एक दुर्लभ और अद्वितीय साधना का प्रमाण है।













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