नवपट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी मुनिराज को अनेकों उपाधियों के साथ अब ‘वात्सल्य रत्नाकर’ के नाम से भी जाना जाएगा। अखिल भारतीय जैन ज्योतिषाचार्य परिषद (पंजी.) ने लगभग 388 जैन संतों के पावन सानिध्य में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी को अभिवंदना पत्र समर्पित किया। इंदौर से पढ़िए, यह खबर…
इंदौर। नवपट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी मुनिराज को अनेकों उपाधियों के साथ अब ‘वात्सल्य रत्नाकर’ के नाम से भी जाना जाएगा। अखिल भारतीय जैन ज्योतिषाचार्य परिषद (पंजी.) ने लगभग 388 जैन संतों के पावन सानिध्य में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के पावन चरणों में सुमति धाम में हुए पट्टाचार्य महामहोत्सव एवं गुरु विराग जन्म जयंती महा महोत्सव के पावन अवसर पर ’अभिवंदना पत्र’ समर्पित करते हुए ‘वात्सल्य रत्नाकर’ की उपाधि से अलंकृत किया। इस सुअवसर पर परिषद के साथ-साथ उपस्थित जन समूह ने करतल ध्वनि से अनुमोदना की। अभिवंदना पत्र वचन के पश्चात सुमति धाम गोधा इस्टेट आयोजक कमेटी ने अखिल भारतीय जैन ज्योतिषाचार्य परिषद (पंजी.) को स्मृति चिन्ह भेंटकर सभी का स्वागत सम्मान किया। इस मौके पर परिषद की सम्मानित सदस्य उर्मिल जैन कनाडा ने अभिवंदना पत्र का वाचन किया। संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष रवि जैन दिल्ली ने कहा कि आचार्य श्री का वात्सल्य अखिल भारतीय जैन ज्योतिषाचार्य परिषद को पूर्व से प्राप्त होता रहा है।
आज गुरुदेव को ‘वात्सल्य रत्नाकर’ की उपाधि से अलंकृत कर पूरी परिषद स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही है। साथ ही महामंत्री डॉ. हुकुमचंद जैन ग्वालियर, कोषाध्यक्ष डॉ. सुमेरचंद जैन दिल्ली, पंडित महावीरप्रसाद जैन आगरा, सुशील जैन दिल्ली, मंजुला जैन उज्जैन, अखिलेश जैन आदिश जैन इंदौर आदि पदाधिकारी उपस्थित रहे।













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