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निकाली गई भव्य शोभायात्रा : वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने दीं रत्नत्रय की प्रतीक 3 दीक्षाएं


प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी वर्ष 2024 का वर्षायोग पारसोला में कर रहे हैं। इस बेला में 6 सितंबर को ब्रह्मचारी प्रदीप जीमुनि श्री प्रणित सागर जी , ब्रह्मचारिणी शकुंतला किकावत आर्यिका श्री प्रेक्षा मति, दिलीप जी अलासे क्षुल्लक श्री प्राप्त सागर जी बने। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…


पारसोला। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी वर्ष 2024 का वर्षायोग पारसोला में कर रहे हैं। इस बेला में 6 सितंबर को ब्रह्मचारी प्रदीप जीमुनि श्री प्रणित सागर जी , ब्रह्मचारिणी शकुंतला किकावत आर्यिका श्री प्रेक्षा मति, दिलीप जी अलासे क्षुल्लक श्री प्राप्त सागर जी बने। श्रीमद् जैन धर्म की यही विशेषता है कि इस धर्म में सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र को धारण कर कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान के बाद चारित्र अर्थात साधु जीवन अपनाना जरूरी है चर्या में परिवर्तन करना ही दीक्षा है, संसार की दौड़ से दूर होना दीक्षा है ।संसारी प्राणी इच्छाओं से ग्रसित है संसार रुलाता है दीक्षा लेकर शिष्य को गुरु संगति में रहना चाहिए ।

जैन धर्म तीर्थंकर भगवान द्वारा प्रतिपादित, अनुमोदित, धारित श्रमण धर्म है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने अपने संयम पुरुषार्थ से श्रमण परंपरा को पुनर्स्थापित किया ।उत्तर भारत में चातुर्मास कर धर्म प्रभावना ,धर्म जागृति ,और सुप्त हो रही समाज को जागृत किया। आज सभी दीक्षार्थी गुरु और परिवार परंपरा अनुसार दीक्षा ले रहे हैं ब्रह्मचारी प्रदीप जी के गृहस्थ अवस्था के पिता,माता,बहन क्षुल्लक समाधि सागर बने ,उनकी माता ने हमसे दीक्षा लेकर आर्यिका मूर्तिमति बनी और बहन भी दीक्षा लेकर आर्यिका सुवैभव मति बनी।

ब्रह्मचारिणी शकुंतला जी के ग्रहस्थ अवस्था के पति ने भी हमसे दीक्षा लेकर मुनी पदम कीर्ति सागर बने और दिलीप जी के बड़े भाई ने भी हमसे दीक्षा लेकर मुनि परमानंद सागर बने तथा पत्नी भी दीक्षा लेकर संघ में आर्यिका विनम्रवती के रूप में है। शिष्य को दीक्षा लेकर गुरु के प्रति कृतज्ञता को दिल में समर्पण भाव के साथ धारण करने से साधना में सफलता मिलती है । यह धर्म देशना आचार्य वर्धमान सागर जी ने दीक्षा के अवसर पर प्रकट की। राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि यह संसार प्रतिकूल है संयम से संसार को अनुकूल बनाया जाता है और इंद्रियों की दासता दूर की जाती है। शिष्य को गुरु को अपना जीवन समर्पित करना चाहिए ख्याति नाम यश पूजा से दूर रहना चाहिए ।इसी पारसोला नगर में सन 1990 में मूलचंदजी घाटलिया ने मुनि दीक्षा लेकर मुनि ओम सागर जी बने आर्यिका पूर्वी मति भी इसी नगर की है साधु अपने जीवन में मृत्यु से भयभीत नहीं होता है साधु जीवन में साधना के बल पर मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है ।प्रथमाचार्य आचार्य शांति सागर जी महाराज ने अपने संयम साधना से श्रमण साघु मार्ग को खोला और 36 दिन की सल्लेखना लेकर समाधि का आदर्श प्रस्तुत किया। आचार्य श्री ने बिसतुनिया ग्राम का जिक्र कर बताया कि इस नगर ग्राम में एक भी जैन परिवार नहीं है राजपूत समाज है उन्होंने मुनी पदम कीर्ति महाराज की समाधि के समय एक बीघा जमीन दान देकर समाधि स्थल बनाया है नगर के नागरिक हर माह संघ के दर्शन हेतु आते हैं।

इसके पूर्व दीक्षार्थियों की शोभा यात्रा श्री वर्द्धमान सागर सभागार में पहुंची । दिगंबर जैन दशा हूमड़ समाज एवं वर्षायोग समिति के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित दीक्षा समारोह श्यामा वाटिका कार्यक्रम सभागार में भगवान और पूर्वाचार्यों का चित्र अनावरण दीप प्रज्वलन दीक्षार्थी परिवार द्वारा किया गया। जयंतीलाल कोठारी अध्यक्ष एवं ऋषभ पचोरी अध्यक्ष चातुर्मास समिति ने बताया कि प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी एवम पूर्वाचार्यो को अर्ध्य समर्पित विभिन्न नगरों से पधारी समाज द्वारा किया गया।सौभाग्यशाली परिवार की 5 महिलाओं द्वारा चोक पूरण की क्रिया की गई। दीक्षार्थ्यों ने आचार्य श्री ने दीक्षा की याचना की तथा आचार्य श्री एवम समस्त साधुओं, दीदी- भैया, श्रावक-श्राविकाओं तथा समाज से क्षमा याचना की।वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी के पंचामृत से चरण प्रक्षालन का सौभाग्य तीनों दीक्षार्थी परिवार को मिला। इस बेला में आचार्य श्री के द्वारा दीक्षार्थी के पंच मुष्ठी केशलोच किये गए तथा दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किये गए। इसके बाद आचार्य श्री ने नामकरण किया।7 प्रतिमा घारी 71 वर्षीय ब्रह्मचारी प्रदीप भैया दाहोद का दीक्षा उपरांत नूतन नाम मुनि श्री प्रणित सागर किया गया। सात प्रतिमा धारी 69 वर्षीय शकुंतला देवी का नाम दीक्षा के बाद आर्यिका श्री प्रेक्षा मति किया गया। 68 वर्षीय दिलीप अलासे का नूतन नाम क्षुल्लक श्री प्राप्त सागर जीकिया गया। पुण्यार्जक परिवार द्वारा पिच्छी कमंडल शास्त्र एवं कपड़े भेंट किये गए। कार्यक्रम का संचालन श्री पंडित कीर्ति पारसोला ने किया। आज दीक्षार्थी के केशलोच हो रहे थे, तब सभी वैराग्यमयी पलों से सभी द्रवित हो रहे थे। परिजनों के दोनों नेत्रों में एक नेत्र में खुशी के आंसू दूसरे नेत्र में दुख के आंसू भी थे। भक्तों के भजनों से वातावरण वैराग्य मय हो रहा था।

आचार्य श्री मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं अन्य साधुओं ने दीक्षार्थी के केशलोचन किये। परिजनों एवं अन्य भक्त जिन्हें केशलोच झेलने का अवसर मिला। वह अपने को पुण्यशाली मान रहे थे। आज प्रातःकाल दीक्षार्थियों ने श्री जी के दर्शन कर पंचामृत अभिषेक पूजन किया, इसके पश्चात आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के दर्शन कर उनके चरणों का प्रक्षालन किया। शकुंतला देवी और श्री दिलीप जी दोनों के केशलोचन साधुओं ने किये। इसके पश्चात दीक्षार्थियों ने हल्दी लगाकर मंगल स्नान किया। आचार्य संघ सानिध्य में तीनों दीक्षार्थियों ने श्री जी का पंचामृत अभिषेक किया।आचार्य वर्धमान सागर जी एवं साधुओं को आहार दिया। साधुओं के आहार के बाद सन्मति भवन से आचार्य वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में तीनों दीक्षार्थियों की शोभा यात्रा हजारों धर्मावलंबियों की उपस्थिति में नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई श्याम वाटिका में पहुंची।

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